बुधवार, 28 जून 2017

हद तो ये है अपने देश में भी पूरा फौज फाटा है ऐसे लोगों का जो मोदी से वैसे ही खौफ खाता है जैसे कंस कृष्ण से। मोदी को घेरने घूरने की कोशिशों के साथ इनका दिन शुरू होता है। अलबत्ता ये मायनो मुक्त हैं।

वातायन बोले तो झरोखा आसपास 

ट्रम्प -मोदी की पांचवीं मुलाक़ात कुछ लोगों को पचाये नहीं पच रही है। 

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला कहतें हैं -मेरे दादा ने भी देसी घी खाया था -मेरी हथेली सूंघ के  देख लो। मनमोहन सिंह जी ने भी कितनों को आतंकी घोषित करवाया था इसमें कोई नै बात नहीं आज हिज़्बुल मुजाहिदीन चीफ सलाहुद्दीन आलमी दहशद गर्द करार दे दिया अमरीका ने तो ये कौन सी उपलब्धि है ?

 वे अपना पूरा होम वर्क करके आये थे लेकिन मम्मी -जी -कोपम्लेक्स से ग्रस्त कांग्रेस जल भून के राख हो गई है। देश हित  में -
एक बोल इसके मुख से नहीं निकलता तो इसकी वजहें मौजूद हैं। मायनो -मम्मी जी को इस देश की राजनीतिक काया पर चर्च ने जिस मकसद से रोपा था वह उस काम में खरी उतरीं हैं। देश हित क्या वह तो पार्टी हित की भी लगातार अनदेखी करतीं आईं हैं। देश वासियों को खंडहर में तब्दील हो चुकी काल शेष सबसे पुरानी  पार्टी कांग्रेस से आज भी हमदर्दी है। 

पाकिस्तान -बनाम दहशद -गर्द -दोनों में से कौन किसे पनाह दे रहा है कहना मुश्किल है। इनका संग  साथ यारी उन दो हट्टे कट्टे पहलवानों सरीखी  है जो पेट तो मिला सकते हैं हाथ नहीं जब जिसका जहां दाव लगता है मनमानी करता है आतंकी वेश में पाकी -फौज़ी या दहशद गर्द कहना मुश्किल है। देश के अंदर भी बाहर भी ये खौफ पैदा करते हैं।बॉर्डर एक्शन टीम इनकी बर्बरता का खुलासा करती है। ये आग खाते हैं अंगारे हगते हैं सांप खाते हैं विषवमन करते हैं।

हद तो ये है अपने देश में भी पूरा फौज फाटा है ऐसे लोगों का जो मोदी से वैसे ही खौफ  खाता है  जैसे कंस कृष्ण से। मोदी को घेरने घूरने  की कोशिशों के साथ इनका दिन शुरू होता है। अलबत्ता ये मायनो मुक्त हैं। 

सोमवार, 12 जून 2017

यदि ऐसी अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल संदीप दीक्षित सोच के लोगों ने पाकिस्तान सेना प्रमुख के बारे में किया होता तो इनके बेशुमार टुकड़े करके डिब्बा बंद कर दिया जाता। स्पीड पोस्ट से वह डिब्बा ही इनके घर पहुंचता। ये पाकिस्तान सोच के लोग साम्प्रदायिकता की बात करते हैं जिन्हें सम्प्रदाय शब्द का सनातनी अर्थ तक नहीं पता। वेदांत के षड -दर्शन छः सम्प्रदाय ही रहे हैं।

http://www.firstpost.com/india/congress-leader-sandeep-dikshit-calls-bipin-rawat-sadak-ka-goonda-bjp-demands-apology-from-sonia-gandhi-3543103.html

भारतीय शौर्य के प्रतीक सेना -प्रमुखों के बारे में कांग्रेस के स्वनाम -धन्य -ताड़का चाची (सोनिया )पूजकों द्वारा अक्सर ऐसी ही बदज़ुबानी की जाती रही है जैसी वर्तमान में शीला दीक्षित सपूत संदीप दीक्षित ने की है। शर्म आती है ये सोचते ऐसी सोच के लोग हमारे सांसद रह चुके हैं। इनकी बे -सउ- री बतलाती है इन्होने माँ की छाती से लगकर दूध नहीं पीया किसी आया -धाया ने ही डिब्बे का दूध पिला  के इन्हें पाला है। 

याद दिलाना ज़रूरी है ऐसी ही बातें घि-घियाके मनीष तिवारी जनरल वी के सिंह के बारे में कह चुके हैं। मणिशंकर ऐयर इन बड़बोलों के सरदार लगते हैं जो कभी भी जुबान संभालके बात नहीं करते। कभी पाक जाके कहते हैं मोदी को हटाओ हमें लाओ ,कभी घाटी में अलगाववादियों की गोद  में बैठके पाकिस्तान सोच की बातें करते हैं। 

यदि ऐसी अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल संदीप दीक्षित सोच के लोगों ने पाकिस्तान सेना प्रमुख के बारे में किया होता तो इनके बेशुमार टुकड़े करके डिब्बा बंद कर दिया जाता। स्पीड पोस्ट से वह डिब्बा ही इनके घर पहुंचता। ये पाकिस्तान सोच के लोग साम्प्रदायिकता की बात करते हैं जिन्हें सम्प्रदाय शब्द का सनातनी अर्थ तक नहीं पता। वेदांत के षड -दर्शन छः सम्प्रदाय ही रहे हैं।  

रविवार, 4 जून 2017

मृत्योर मोक्ष्य -अर्थात जिन अवगुणों ने हमें बांध के रखा है जिसकी वजह से ही हमें अकस्मात मृत्यु का सामना करना पड़ता है बदकिस्मती से हमें बाँध के रखा गया है और जन्म मृत्यु के इस चक्र से हमें मोक्ष नहीं मिलता, इसी चक्र से हमें मोक्ष दिलाइये।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं  पुष्टिवर्धनं। 

उर्वारुकमिव बंधनां मृत्योर्मुक्षीय   माम्रतात || 

यह महामृत्युंजय मंत्र ऋगवेद से उत्पन्न है। इसके उच्चारण मात्र से मृत्यु का भय  हर जाता है। मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी यह मंत्र सरल कर देता है। महामृत्युंजय के मन्त्र का जाप १ ० ८ बार करने से इच्छित फल प्राप्ति होती है। 

 आइये इस महामंत्र को गहराई से समझें :

हालाकि यह मंत्र ॐ शब्द से आरम्भ होता है लेकिन ऋग्वेद में ये ॐ शब्द नहीं हैं। यह ॐ शब्द हर मंत्र के आरम्भ में श्रीगणेश के स्मरण में जोड़ दिया जाता है ताकि मंत्र का जाप निर्विघ्न हो सके। 

त्रयम्बकं (त्र्यंबकं ) -ये शब्द शिव के  तीन नेत्रों का प्रतीक है। इसमें -

त्र्य -का मतलब तीन 

अम्बकम -का अर्थ है आँखें या नेत्र। 

यही 'ब्रह्मा -विष्णु -महेश ' यानी त्रिमूर्ति का प्रतीक है। त्र्यम्बकम शब्द को फिर एक बार गहराई से देखें -इस शब्द में एक और शब्द छिपा हुआ है -अम्बा यानी महाशक्ति जिसमें सरस्वती -लक्ष्मी -गौरी समाई है। यानी एक ही त्र्यंबकम शब्द में शिव और शक्ति का वास है। 

यजा-महे  यानी मैं आपका गुणगान करता हूँ। 

सुगन्धिं -यानी सुगंध ये सुगंध है प्राण -प्रभु ,उपस्थिति एवं आत्मबल का। 

इसी सुगंध से मानव त्रियंबकं की आराधना करते हैं। 

पुष्टिवर्धनं -यानी हे , हर !संसार तुम्ही से आरम्भ होता है और तुम्ही में उसी का अंत है। 

पुष्टिवर्धनं यानी हितकर (हितकारी ). 

तुम्हारा आदि अंत और मध्य नहीं है। हम सब तुम्हारे बच्चें हैं। आप ही परमपिता हो। आप ही हमें वर दे सकते हो। 

उर्वारुक्मेव -

यहां उर्वा का अर्थ विशाल है। और -

रुक्मेव का मतलब है -रोग। 

इसलिए उर्वारुकमिव का मतलब है हमें विशाल रोगों ने या अवगुणों ने घेर रखा है। जैसे के अविद्या ,असत्य और षदरिपु यानी की कमज़ोरी। ये कमज़ोरी और असत्य ही है जिनकी वजह से ये जानते हुए भी कि आप हर जगह हैं हम अपने कान और नेत्रों की ही बात मानते हैं। 

बंधनां  -इस शब्द को उर्वारुकमिव के साथ पढ़ना चाहिए।तब इसका अर्थ निकलता है ,जिन विशाल अवगुणों से हमें बाँध के रखा है यानी उर्वारुकमिव बंधनां। 

मृत्योर मोक्ष्य -अर्थात जिन अवगुणों ने हमें बांध के रखा है जिसकी वजह से ही हमें अकस्मात मृत्यु का सामना करना पड़ता है बदकिस्मती से हमें बाँध के रखा गया है और जन्म मृत्यु के इस चक्र से हमें मोक्ष नहीं मिलता, इसी चक्र से हमें मोक्ष दिलाइये। 

यमां  -अमृतात-अर्थात  आप ही अमृत दीजिये जिससे मुझे मोक्ष एवं निर्वाण प्राप्ति हो। 

https://www.youtube.com/watch?v=Br3Ed_D2ydc 

शुक्रवार, 2 जून 2017

ज्ञान तिहारो आधो अधूरो मानो या मत मानो , प्रेम में का आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो।


     ज्ञान तिहारो आधो अधूरो मानो या मत मानो ,

     प्रेम में का  आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो।  

     प्रेम की भाषा न्यारी है ,
    
      ये ढ़ाई अक्षर प्रेम एक सातन पे भारी है। 

     कहत नहीं आवै सब्दन में ,

     जैसे गूंगो गुड़ खाय स्वाद पावै मन ही मन में। 

                              (१ )

   का करें हम ऐसे ईश्वर को ,जो द्वार हमारे आ न सके ,

   माखन की चोरी कर न सके ,मुरली की तान सुना न सके। 

   मन हर न सके ,छल कर न सके ,दुःख  दे न सके तरसा न सके। 

   जो हमरे हृदय लग न सके ,हृदय से हमें लगा न सके। 

   ऐसो ईश्वर छोड़ हमारे मोहन को पहचानो ,

   प्रेम में का आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो। 

   प्रेम की मीठी बाणी  है ,खारो है ज्ञान को सिंधु ,

   प्रेम जमुना को पानी है। प्रेम -रस बहि रह्यो नस -नस में ,

   अरे ,नैन -बैन ,सुख -चैन ,रेन -दिन ,कछु नाहीं बस में। 

                           (  २ )

  ब्रह्म ज्ञान को कछु दिना ,छींके पे धर देओ ,

 हम गोपिन संग बैठ के ,प्रेम की शिक्षा लेओ। 

भले मानुस बन जाओगे ,जप -जोग ,ज्ञान तप छोड़ ,

प्रेम के ही गुण गाओगे ,निर्गुण को भूल मेरे गुण वारे के गुण गाओगे. 

कछु दिन रहि देखो ब्रज में ,है प्रेम ही प्रेम की गंध ,

यहां की प्रेम भरी रज में। 

                      (३ )

कोई मोहिनी मूरत ,सोहिनी सूरत जादिन जादू कर जाएगी ,

प्रेम की नागिन डस जाएगी ,ये वस्तर होंगे तार -तार ,

लट घूंघर सारी बिगर जाएगी।पीर करेजे भर जाएगी। 

 जब प्रेम की मदिरा चाखोगे ,तो ज्ञान की भाषा तर जाएगी ,

ऊधौ जब दशा बिगर जाएगी ,

डगमग -डगमग चाल चलोगे ,लोग कहें दीवानो ,

प्रेम में का आनंद रे ऊधौ ,प्रेम करो तो जानो। 

सखा बौराये डोलोगे ,यूं ही पगलाए डोलोगे ,

तुम ज्ञान की भाषा छोड़ हमारी बोली बोलेगे। 

प्रेम दधि ऊधौ का जानो ,है प्रेम जगत में सार ,

हमारे अनुभव की मानो। 

                 (४ )

दृढ करने को प्रेम पर उद्धव का विश्वास सखियाँ उनको ले चलीं ,

राधाजी के पास।  ये ही श्री राधारानी हैं ,

श्रीकृष्ण चन्द के अमर प्रेम की अमिट  कहानी हैं। 

इन्हें परनाम करो ऊधौ ,कछु धर्म -अर्थ काम और  मोक्ष को ,

मिल जायेगो सूधो। 

                     (५ )

ऊधौ जी  को मिल गयो ,सांचो प्रेम प्रमाण ,

भरम  गया संशय गयो ,जागो सांचो ज्ञान।

राम (कृष्ण )और राधे को संग जो पायो ,

तो आँख खुली और बुद्धि हिरानी ,

ऊधौ  बेचारो समझ नहीं पायो ,

के वास्तव क्या है क्या है कहानी। 

प्रेम की ऐसी अवस्था जो देखी तो ,

ज्ञान गुमान पे फिर गया पानी।

भगतन के बस में जो भगवन देखे ,

तो प्रेम और भक्ति की महिमा जानी। 

प्रेम से भर गया श्रद्धा से भर गयो ,

चरणों में परि गयो ब्रह्म को ग्यानी।

भाव -सार :कृष्ण सखा हैं उद्धवजी के ,ब्रह्म ग्यानी उद्धव निर्गुण ब्रह्म  उपासक  हैं । गोपियाँ सगुण ब्रह्म की उपासक हैं प्रेमाभक्ति से संसिक्त हैं जहां विरह चरम है प्रेम का ,जो ईशवर के निकट ले आता है ,उपासक और उपास्य में अभेद हो जाता है, लेकिन भक्ति का स्वाद चखाने तथा ये जतलाने के भक्ति के बिना ज्ञान अधूरा है ऊधौ जी को कृष्ण  गोपियों के पास भेजते हैं।गोपियों को कृष्ण प्रेम (विरह )में व्याकुल देख उनका अभिमान चूर -चूर हो जाता है ,वह मन में संकल्प लेते हैं अगले जन्म में प्रभु मुझे ब्रज की घास बनाना ताकि प्रेमासिक्त गोपियों के चरण रज को मेरा मस्तक मिल सके। 
अद्वैत वाद के प्रवर्तक आचार्यशंकर (शंकाराचार्य )ने    स्वयं अपने जीवन के आखिरी चरण में कृष्ण भक्ति के अनेक पद लिखें हैं ,देवकी पुत्र कृष्ण को यानी ब्रह्म के सगुन  स्वरूप को ही सर्वोपरि स्थान दिया है। 

भक्तिवेदांति ऐसा मानते हैं ब्रह्म ग्यानी ब्रह्म लोक तक जाता है कृष्ण भक्त (सगुन उपासक )गोलोक (कृष्ण लोक ,वैकुण्ठ )जाते हैं और वहीँ लय हो जाता है उनका कृष्ण में आवागमन से मुक्त हो जाते हैं भक्त। 

स्वयं ब्रह्मा की भी अपनी एक आयु है टेन्योर है फिर ब्रह्मज्ञानियों की कौन कहे ?
पुनरपि जनमम् पुनरपि मरणम ,पुनरपि जननी जठरे शयनम। 

बुधवार, 31 मई 2017

सब जीवों में उस परमात्मा की ज्योति का ही आलोक है ,सब उसी से सिंचित हैं ; वह पावन परम आलोक गुरु की कृपा और शिक्षा (सीख ) से ही प्रकट होता है। उस परम ज्योति को जो भी स्वीकार्य होता है ,वही पूजा बन जाती है

रागु धनासरी महला १ 

गगनमै थालु  रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती। 

धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती || (१ ) || 

कैसी आरती होइ | भवखंडना तेरी आरती।अनहता सबद वाजंत भेरी || १ || रहाउ ||   

सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही।  

सहस पद विमल  नन एक पद गंध बिनु  सहस तव गंध इव चलत मोही || २ || 

सभ महि जोति जोति है सोइ | तिस दै चान िण सभ महि चानणु होइ। 

गुरसाखी जोति परगटु होइ | जो तिसु भावै  सु आरती होइ | | ३ || 

हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा | 

क्रिपा जलु  देहि नानक सारिंग कउ होइ जा  ते तेरै नाइ वासा || ४|| ३ || 

ऐसा समझा जाता है यह आरती  गुरुनानक देव जी ने जगन्नाथ के मंदिर में पंडों के बाहरी कर्मकांडों (रिचुअल्स )पे सारा जोर देखते हुए उन्हें चेताने के लिए मंदिर के बाहर आकर गाई। 

व्याख्या (भाव सार ) :

हे प्रभु ,तुम्हारे पूजन के लिए गगन के थाल में चंद्र और सूर्य के दो दीप जले हैं और समूचा तारामंडल मानो थाल में मोती जड़े हैं। स्वयं मलयगिरि (चंदन -वन- परबत )के चंदन की गंध धूप की सुगन्धि है ,पवन चँवर झुला रहा है ,तथा सृष्टि की समूची वनस्पति ही ,हे परमात्मा तुम्हारी आराधना के पुष्प हैं। तुम्हारी यह प्राकृतिक आरती नित्य और अति मनोहर है | हे भवखण्डन (आवागमन का नाश करने वाले )प्रभु ,यह तेरी मनमोहक आरती है | तुम्हारे सब जीवों के अंदर बज रहा अनहद (अनाहत )शब्द ही मंदिर की भेरी है। || १ || रहाउ || 

(जिस प्रभु की स्तुति में आरती गाई जा रही है ,वह सब जीवों के भीतर निवास करता है ,इसलिए हे परमेश्वर !)तुम्हारी असंख्य आँखें हैं (अर्थात सब जीव तुम्हारा ही रूप हैं ,इसलिए उनकी आँखें तुम्हारी ही तो हैं )किन्तु तुम्हारी कोई भी आँख नहीं। इसी प्रकार तुम्हारी सहस्रों शक्लें हैं ,किन्तु फिर भी तुम्हारी कोई भी शक्ल नहीं (अर्थात तुम निर्गुण निराकार हो )| तुम्हारे असंख्य विमल चरण हैं ,निर्गुण रूप में कोई चरण नहीं। सगुण रूप में प्रकट होने पर (इन सब जीवों के रूप में )तुम्हारी असंख्य नासिकाएं गंध लेती हैं ,अन्यथा निराकार रूप में तुम्हारी कोई नासिका नहीं। यह तुम्हारा विचित्र कौतुक है ,जिसे देख -देखकर मेरा मन मोहित हो रहा है || २ || 

सब जीवों में उस परमात्मा की ज्योति का ही आलोक है ,सब उसी से सिंचित हैं ; वह पावन परम आलोक गुरु की कृपा और शिक्षा (सीख ) से ही प्रकट होता है। उस परम ज्योति को जो भी स्वीकार्य होता है ,वही पूजा बन जाती है || ३ || 

हे परमात्मा ,तुम्हारे  चरण  कमलों के मकरंद का प्यार मुझे रात- दिन रहता है | गुरुनानक देव कहते हैं  ,हे कृपानिधि ,मुझ पपीहे (चातक )को अपनी कृपा की स्वाति -बूँद प्रदान कर ,जिससे में परमात्मा  के नाम  ही में लीन हो  जाऊँ || ४ || ३ ||   

सोमवार, 29 मई 2017

ग़ज़ल :मुसाफिर -वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )



ग़ज़ल :मुसाफिर -वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )


मुसाफिर तो मुसाफिर है ,उसका घर नहीं होता ,
यूं सारे घर उसी के हैं ,वह बे -घर नहीं होता ,
ये दुनिया खुद मुसाफिर है ,सफर कोई घर नहीं होता ,
सफर तो आना जाना है ,सफर कमतर नहीं होता ।
मुसाफिर अपनी मस्ती में ,किसी से कम नहीं होता ,
गिला उसको नहीं होता उसे कोई गम नहीं होता ।
मुसाफिर का भले ही अपना कोई घर नहीं होता ,
मुसाफिर सबका होता है ,उसे कोई डर नहीं होता ।
गो अपने घर में अटका आदमी ,बदतर नहीं होता ,
सफर में चलने वाले से ,मगर बेहतर नहीं होता ।

सहभाव :डॉ .नन्द लाल मेहता "वागीश "

शनिवार, 27 मई 2017

अच्छे -अच्छे रिश्तों को भी , नज़दीकियों ने तोड़ा है, कुछ तुम ठहरो कुछ हम संभले , अब फिर से दूरी हो जाए ,

"इक रुकी हुई कविता मेरी ,अधपकी हुई भविता मेरी "-कमांडर निशांत शर्मा 
                               (१) 
              इक रुकी हुई कविता मेरी ,

            अधपकी हुई भविता मेरी ,

            कुछ  आज यूं पूरी हो जाए,

            कुछ बादल गरजें सूरज पर ,

           ये शाम सिन्दूरी हो जाए। 

                         (२)
           बस खामखाँ की बातों में ,

          यूँ हम तुम जाया हो बैठे ,

          दो पल और बैठो संग मेरे ,

          कुछ बात ज़रूरी हो जाए। 

                      (३) 

          इक उम्र गुज़र गई सोने में ,

         खाबों को बुनकर खोने में ,

        कुछ ख्वाहिशों की अर्ज़ी को ,

         बस आज स्वीकृति हो जाए। 

                   (४ )

         रस्मों -कसमों  , कर्ज़ों -फ़र्ज़ों ,

         की तानाशही कौन सहे  ,

        अब सर आँखों पे हुक्म -ए -दिल ,

        कुछ 'जी -हुज़ूरी ' हो जाए ,

                  (५) 

         अच्छे -अच्छे रिश्तों को भी ,

        नज़दीकियों ने  तोड़ा है,

        कुछ तुम ठहरो कुछ हम संभले  ,

        अब फिर से दूरी हो जाए ,

        इक रुकी हुई कविता मेरी ,

        बस आज यूँ पूरी हो जाए। 


        प्रस्तुति :वीरुभाई