गुरुवार, 28 अगस्त 2014

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी : ______________डॉ. वागीश मेहता डी.लिट. १२१८ /४ अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाण) भारत



सुमिरन की सुधि यों  करो ,ज्यों गागर पनिहारी ,

बोलत  डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि  

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी :


                       ______________डॉ. वागीश मेहता डी.लिट. १२१८ /४                                                       अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाण)
                                                    भारत  

तस्वीर

(डॉ। नन्द लाल मेहता वागीश )

वस्तुत : मनुष्य ,को मन ,बुद्धि ,भाव ,तर्क और उद्भावना की जिन लौकिक स्थितियों से  गुज़रना  होता है

उसी से संबंधित बोध की शब्दावली से उसे अध्यात्म को कहना और समझना पड़ता है। तत्वत: यूं कहा  जा

सकता है कि अध्यात्म कोई आकाशीय अनुभूतियों का विषय नहीं। वह मनुष्य की अंतरात्मा की पुकार है

और मनुष्य की अंतर -आत्मा उसके अंत :करण का ही एक भाव होता है।अंत :करण पर भी मनुष्य के

बहिर -करणों  (इन्द्रियों )का प्रभाव पड़ता है।

साधना के द्वारा विवेकपूर्ण ढंग से मनुष्य अध्यात्म भूमिका में उतरता है। जिस प्रकार शरीर के अस्तित्व के

बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ठीक उसी प्रकार अनुभूत शब्दावली के बिना अध्यात्म जगत में



भी नहीं किया जा सकता। लौकिक अनुभूतियों का उदात्तीकरण ही  अध्यात्म की अभिव्यक्ति में सहायक

होता है जैसे महाकवि कबीर ने इस साखी में सुरति शब्द का प्रयोग किया है-

मूलत : तंत्र फिर योग और आध्यात्मिक अनुभूति का वाचक यह शब्द बहुत गहरा अर्थ रखता है।

तंत्र का सुरति शब्द अर्थात रतिजन्य सर्वोच्च आनंद अध्यात्म में लय योग का वाचक हो जाता है। अर्थात

कुण्डलनी से उथ्थित ऊर्जा सुषम्ना से होती हुई जैसे सहस्रार स्थिति में लीन  हो जाती है और साधक को एक

उच्च कोटि के आनंद की आध्यात्मिक अनुभूति होती है ठीक उसी प्रकार ध्यान की इस उच्च अवस्था में पहुंचा

हुआ मन भी एकतान होकर निश्चिन्त हो जाता है और उसकी  गतिशक्ति अपने ध्येय को सम्पूर्णता से अपने

अधीन कर लेती है।

कबीर ने लययोग की इस अध्यात्म अनुभूति को लौकिक दृष्टांत के माध्यम से बहुत सहजता से समझा दिया

है। जैसे पनघट से पानी भरकर लौटती हुई ग्राम बाला के सिर  पर प्राय : एक से अधिक घट रखे रहते हैं और

सखियों के संग लौटती हुई वे सभी परस्पर वार्ता और हंसी विनोद भी करती रहतीं हैं। रास्ता बहुत समतल भी

नहीं  पैर ऊपर नीचे भी पड़ते हैं। ये सब होते हुए भी उन ग्राम बालाओं  के सिर पर रखे हुए घड़े सुस्थिर

रूप से अपने गंतव्य तक पहुँच जाते हैं। इसका मूल कारण यही है कि उन बालाओं की मनोलयता जल से भरे

हुए उन घड़ों में टिकी रहती है। यह एक प्रकार से मन की सुरति है।

कवि कबीर कहते हैं कि साधक को सम्पूर्ण लययोग से अपने इष्ट देव के स्मरण में डूब जाना चाहिए ठीक वैसे

जैसे पनिहारिन की मनोलयता अपने सिर पर रखे जलघट में एक रूप हो जाती है। एक भक्त और साधक को

भी उसी तल्लीनता से अपने इष्ट देव के नाम स्मरण में एक रूप हो जाना चाहिए।

पानी भरकर लाने वाली ग्रामबाला चलते हुए डोलते हुए और सखियों संग वार्ता करते हुए भी जिस प्रकार

अपनी सुरति को घट में लगाए रखती है उसी प्रकार संसार का व्यवहार करते हुए भी साधक की सुरति अपने

इष्ट देव के नाम स्मरण को अर्पित होनी चाहिए।

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी। 

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ,

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्। 

                          (श्रीमद् भगवतगीता आठवां अध्याय सातवा श्लोक )

Therefore always remember me and also do your duty of fighting the war .With mind and intellect surrendered to me ,you will definitely attain me ; of this ,there is no doubt .


The first line of this verse is the essence of teachings of Bhagavad  Gita .It has the power of making our life divine .It also encapsulates the definition of karm yog .Shree Krishna says ,"keep your mind attached to me ,and do your worldly duty with your body ." This applies to people in all walks of life -doctors ,engineers ,advocates ,housewives ,students ,etc .In Arjun's specific case ,he is a warrior and his duty is to fight .So he is being instructed to fulfill his duty ,while keeping his mind in God .Some people neglect their worldly duties on the plea that they have taken to spiritual life .Others excuse themselves from spiritual practice on the pretext of worldly engagements .People believe that spiritual and   material pursuits are irreconcilable .But God's message is to sanctify one's entire life .

When we practice such karm yog ,the worldly works will not suffer because the body is being engaged in them .But since the mind is attached to God ,these works will not bind one in law karma .Only those works result in karmic reactions which are performed with attachment .When that attachment does not exists ,even worldly law does not hold one culpable .For example ,let us say that one man killed another and is brought to court .The judge asks him ,"Did you kill that man ?The man replies ,"yes your honor ,there is no need of any witness .I confess that I killed him ."Then you should be punished !"  "No ,your honor ,you can not punish ." "Why?"  "  I had no intention to kill .I was driving the car on the proper side of the road ,within speed limits ,with my eyes focused ahead .My brakes ,steering ,everything was perfect .That man suddenly ran in front of my car .What could I do ?"If his attorney can establish that the intention to kill did not exist ,the judge will let him off without even the slightest punishment .

From the above example we see that even in the world we are not culpable for those actions we perform without attachment.The same principle holds for the law of karma .that is why ,during the Mahabharat war ,following Shri Krishna's instructions ,Arjun did his duty in the battlefield .By the end of war ,Shri Krishna noted that Arjun did not accrue any bad karma .He would have been entangled in karma if he had been fighting the battle with attachment ,for worldly gain and fame .However ,his mind was attached to Shri Krishna ,and so what he was doing was multiplication in zeros ,performing his duty in this world without selfish attachment .Even if you multiply one million with zero ,the answer will be zero .

The condition for karm yog has been stated very clearly in this verse :

The mind must be constantly engaged in thinkig of God .The moment mind forgets God ,it comes under the attack of the big generals of Maya's (material energy of Lord Krishna ) army -lust ,anger ,greed ,envy ,hatred ,etc .Thus ,it is important to always keep it attached to God .Often people claim to be karm yogis because they say they do both -karm and yog (meditation on God ).But this is not the definition of karm yog that Shri Krishna has given .He states that -

(1 )even while doing the work ,the mind must be engaged in thinking of God ,and 

(2) the remembrance of God must not be intermittent ,but constant throughout the day .

Saint Kabir expresses this in his famous couplet :

सुमिरन की सुधि यों  करो ,ज्यों गागर पनिहारी ,

बोलत  डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि  .

"Remember God just as the village woman remembers the water pot on her head .She speaks with others and walks on the path ,but her mind keeps holding onto the pot ."

Shri Krishna explains the  karm yog in this verse .


A statue of Arjuna and Lord Krishna, with Krishna as the sarathi or charioteer

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी : ______________डॉ. वागीश मेहता डी.लिट. १२१८ /४ अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाण) भारत



सुमिरन की सुधि यों  करो ,ज्यों गागर पनिहारी ,

बोलत  डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि  

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी :


                       ______________डॉ. वागीश मेहता डी.लिट. १२१८ /४                                                       अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाण)
                                                    भारत  

तस्वीर

(डॉ। नन्द लाल मेहता वागीश )

वस्तुत : मनुष्य ,को मन ,बुद्धि ,भाव ,तर्क और उद्भावना की जिन लौकिक स्थितियों से  गुज़रना  होता है

उसी से संबंधित बोध की शब्दावली से उसे अध्यात्म को कहना और समझना पड़ता है। तत्वत: यूं कहा  जा

सकता है कि अध्यात्म कोई आकाशीय अनुभूतियों का विषय नहीं। वह मनुष्य की अंतरात्मा की पुकार है

और मनुष्य की अंतर -आत्मा उसके अंत :करण का ही एक भाव होता है।अंत :करण पर भी मनुष्य के

बहिर -करणों  (इन्द्रियों )का प्रभाव पड़ता है।

साधना के द्वारा विवेकपूर्ण ढंग से मनुष्य अध्यात्म भूमिका में उतरता है। जिस प्रकार शरीर के अस्तित्व के

बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ठीक उसी प्रकार अनुभूत शब्दावली के बिना अध्यात्म जगत में



भी नहीं किया जा सकता। लौकिक अनुभूतियों का उदात्तीकरण ही  अध्यात्म की अभिव्यक्ति में सहायक

होता है जैसे महाकवि कबीर ने इस साखी में सुरति शब्द का प्रयोग किया है-

मूलत : तंत्र फिर योग और आध्यात्मिक अनुभूति का वाचक यह शब्द बहुत गहरा अर्थ रखता है।

तंत्र का सुरति शब्द अर्थात रतिजन्य सर्वोच्च आनंद अध्यात्म में लय योग का वाचक हो जाता है। अर्थात

कुण्डलनी से उथ्थित ऊर्जा सुषम्ना से होती हुई जैसे सहस्रार स्थिति में लीन  हो जाती है और साधक को एक

उच्च कोटि के आनंद की आध्यात्मिक अनुभूति होती है ठीक उसी प्रकार ध्यान की इस उच्च अवस्था में पहुंचा

हुआ मन भी एकतान होकर निश्चिन्त हो जाता है और उसकी  गतिशक्ति अपने ध्येय को सम्पूर्णता से अपने

अधीन कर लेती है।

कबीर ने लययोग की इस अध्यात्म अनुभूति को लौकिक दृष्टांत के माध्यम से बहुत सहजता से समझा दिया

है। जैसे पनघट से पानी भरकर लौटती हुई ग्राम बाला के सिर  पर प्राय : एक से अधिक घट रखे रहते हैं और

सखियों के संग लौटती हुई वे सभी परस्पर वार्ता और हंसी विनोद भी करती रहतीं हैं। रास्ता बहुत समतल भी

नहीं  पैर ऊपर नीचे भी पड़ते हैं। ये सब होते हुए भी उन ग्राम बालाओं  के सिर पर रखे हुए घड़े सुस्थिर

रूप से अपने गंतव्य तक पहुँच जाते हैं। इसका मूल कारण यही है कि उन बालाओं की मनोलयता जल से भरे

हुए उन घड़ों में टिकी रहती है। यह एक प्रकार से मन की सुरति है।

कवि कबीर कहते हैं कि साधक को सम्पूर्ण लययोग से अपने इष्ट देव के स्मरण में डूब जाना चाहिए ठीक वैसे

जैसे पनिहारिन की मनोलयता अपने सिर पर रखे जलघट में एक रूप हो जाती है। एक भक्त और साधक को

भी उसी तल्लीनता से अपने इष्ट देव के नाम स्मरण में एक रूप हो जाना चाहिए।

पानी भरकर लाने वाली ग्रामबाला चलते हुए डोलते हुए और सखियों संग वार्ता करते हुए भी जिस प्रकार

अपनी सुरति को घट में लगाए रखती है उसी प्रकार संसार का व्यवहार करते हुए भी साधक की सुरति अपने

इष्ट देव के नाम स्मरण को अर्पित होनी चाहिए।

कर्म योग की दीक्षा देती है कबीर की ये साखी। 

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ,

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्। 

                          (श्रीमद् भगवतगीता आठवां अध्याय सातवा श्लोक )

Therefore always remember me and also do your duty of fighting the war .With mind and intellect surrendered to me ,you will definitely attain me ; of this ,there is no doubt .


The first line of this verse is the essence of teachings of Bhagavad  Gita .It has the power of making our life divine .It also encapsulates the definition of karm yog .Shree Krishna says ,"keep your mind attached to me ,and do your worldly duty with your body ." This applies to people in all walks of life -doctors ,engineers ,advocates ,housewives ,students ,etc .In Arjun's specific case ,he is a warrior and his duty is to fight .So he is being instructed to fulfill his duty ,while keeping his mind in God .Some people neglect their worldly duties on the plea that they have taken to spiritual life .Others excuse themselves from spiritual practice on the pretext of worldly engagements .People believe that spiritual and   material pursuits are irreconcilable .But God's message is to sanctify one's entire life .

When we practice such karm yog ,the worldly works will not suffer because the body is being engaged in them .But since the mind is attached to God ,these works will not bind one in law karma .Only those works result in karmic reactions which are performed with attachment .When that attachment does not exists ,even worldly law does not hold one culpable .For example ,let us say that one man killed another and is brought to court .The judge asks him ,"Did you kill that man ?The man replies ,"yes your honor ,there is no need of any witness .I confess that I killed him ."Then you should be punished !"  "No ,your honor ,you can not punish ." "Why?"  "  I had no intention to kill .I was driving the car on the proper side of the road ,within speed limits ,with my eyes focused ahead .My brakes ,steering ,everything was perfect .That man suddenly ran in front of my car .What could I do ?"If his attorney can establish that the intention to kill did not exist ,the judge will let him off without even the slightest punishment .

From the above example we see that even in the world we are not culpable for those actions we perform without attachment.The same principle holds for the law of karma .that is why ,during the Mahabharat war ,following Shri Krishna's instructions ,Arjun did his duty in the battlefield .By the end of war ,Shri Krishna noted that Arjun did not accrue any bad karma .He would have been entangled in karma if he had been fighting the battle with attachment ,for worldly gain and fame .However ,his mind was attached to Shri Krishna ,and so what he was doing was multiplication in zeros ,performing his duty in this world without selfish attachment .Even if you multiply one million with zero ,the answer will be zero .

The condition for karm yog has been stated very clearly in this verse :

The mind must be constantly engaged in thinkig of God .The moment mind forgets God ,it comes under the attack of the big generals of Maya's (material energy of Lord Krishna ) army -lust ,anger ,greed ,envy ,hatred ,etc .Thus ,it is important to always keep it attached to God .Often people claim to be karm yogis because they say they do both -karm and yog (meditation on God ).But this is not the definition of karm yog that Shri Krishna has given .He states that -

(1 )even while doing the work ,the mind must be engaged in thinking of God ,and 

(2) the remembrance of God must not be intermittent ,but constant throughout the day .

Saint Kabir expresses this in his famous couplet :

सुमिरन की सुधि यों  करो ,ज्यों गागर पनिहारी ,

बोलत  डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि  .

"Remember God just as the village woman remembers the water pot on her head .She speaks with others and walks on the path ,but her mind keeps holding onto the pot ."

Shri Krishna explains the  karm yog in this verse .


A statue of Arjuna and Lord Krishna, with Krishna as the sarathi or charioteer

बुधवार, 27 अगस्त 2014

सुमिरन की सुधि यों करो ,ज्यों गागर पनिहारी ; बोलत डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि

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सुमिरन की सुधि यों  करो ,ज्यों गागर पनिहारी ;  

बोलत  डोलत सुरति में ,कहे कबीर विचारि। 


कबीर कहते हैं भगवान का स्मरण चलते फिरते काम करते ऐसे ही रहे जैसे पनिहारिन ऊंची नींची पगडंडी पर चलते हुए भले  सहेलियों से भी बतियाती चलती है परन्तु उसका ध्यान गगरी में भरे जल की ओर  आंतरिक  रूप में रहता है। वैसे ही भगवान की याद में उसके ध्यान में अपनी सत्ता को इस कदर खो देना कि ध्याता और ध्यान एक हो जाए। भले व्यक्ति सांसारिक काम करता रहे पर उसका ध्यान हृदय में बैठे ईश्वर की तरफ वैसे ही रहे जैसे पनिहारिन का  गगरी में भरे जल की तरफ निरंतर रहता है।

गीता के आठवें अध्याय के श्लोक संख्या सात पर गौर कीजिए :

तस्मात् सर्वेषु कालेषु ,माम् अनुस्मर युध्य च ,

मय्य्  अर्पितमनोबुद्धिर् ,माम् एवैष्यस्य् अशंसयम असंशयम्।

तस्मात् =इसलिए , सर्वेषु =सब में ,कालेषु =कालों में ,हर पहर ,माम् =मुझे ,अनुस्मर =याद ,स्मरण ,युध्य =युद्ध में ,संग्राम में ,च =और ,मय्य् =मुझे ,अर्पित =समर्पण , मन :=मन , बुद्धि :=प्रज्ञा -बुद्धि ,सोचने समझने की शक्ति ,माम् =मुझे ,एव =अवश्य ही ,एशयसि =तुम प्राप्त करोगे अशंश :=निस्संदेह।

भगवान अर्जुन को कह रहे हैं कि सभी समय में ,सभी परिस्थितियों  में ,जीवन की हर अवस्था में प्रत्येक आश्रम में जीवन की प्रत्येक पुरुषार्थ के साथ मेरा स्मरण विस्मृत न होने पाये ,सदैव मेरा स्मरण करते रहो। अपने कर्तव्य कर्मों को न छोड़ते  हुए मेरी स्मृति बनी रहे ,ध्यान मेरी तरफ ही बना रहे। लेकिन बहुत करुणा की बात है कि कुछ लोग ऐसे हैं कि जिनके जीवन में भगवान का स्मरण तो बना रहता है लेकिन अपने कर्तव्य कर्मों को बहुत पीछे छोड़ देते हैं। और कुछ लोग  जो अपने कर्तव्य कर्मों में इतना डूब जाते हैं कि जीवन पूरा हो जाता है और जीवन देने वाले की याद नहीं आती है। बहुत आश्चर्य की बात है कि कई बार भगवान की  कही हुई बातों का जब तक पता चल पाता है तब तक जीवन ही पूरा हो चुका होता है।


उठते बैठते हर पहर निरंतर  उसकी याद में रहते सांसारिक कर्म करते रहना ही सहज कर्मयोग है पनिहारिन की तरह।

तन काम में मन राम में रहे यही कर्म योग है। 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

चर्च से प्रेरित माँ और चर्च से प्रेरित शहज़ादा

पिछले दिनों राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी के जन्म दिवस (जयंती )पर महिलाओं के बीच में कहा -

कि तुम्हें  माँ बहन कहने वाले और मंदिर में जाने वाले ही तुम्हें छेड़ते हैं ,तुम्हारे साथ दुराचार करते हैं। इसमें

दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात तो ये कि नारी के प्रति सम्मानजनक सम्बोधन माँ -बहिन कहने और

उसी भाव में जीने की जो भारतीय पद्धति है उसका राहुल गांधी ने उपहास उड़ाया है। जिस परिवेश में यह

शहज़ादा पला है वहां मिस /मिसिज़ और मिस्टर के अलावा कोई शब्द ही नहीं है। माँ -बहिन जैसे पवित्र शब्दों

का उपहास उड़ाकर उसने कांग्रेस के दिवालियापन का ही सुबूत दिया है।  


दूसरी बात भी भारत की सांस्कृतिक जीवन पद्धति से जुड़ी  है  । भारतधर्मी समाज के सभी मत -मतान्तरों

और वर्गों के देवालय मंदिर कहलाते हैं ,शहज़ादे ने मंदिरों पर दोषारोपण किया है और परोक्षता सम्पूर्ण

भारतधर्मी समाज को लांछित किया है कि मंदिरों में जाने वाले दुराचारी होते हैं। परोक्षता उन्होंने ये कह दिया

है कि चर्च और मस्जिदों में जाना चाहिए। राम नाम कहने वाले ही करते हैं सारी  बदमाशियां। जो लोग

गिरजाघर और मस्जिदों में जाते हैं वे सदाचारी होते हैं। इस्लाम को यहां वे यह सन्देश भी दे देते हैं कि हम

तुम्हें कुछ नहीं कहते।

एक साथ वोट की राजनीति में कट्टरपंथी  मुस्लिमों को और धर्मांतरणवादी चर्च के (अनाचार्य )पादरियों को

संतुष्ट  कर वोट की गोटी इस शहज़ादे ने चली है। ये देश का दुर्भाग्य है कि धर्मांतरण की फसल काटने की

घोषणा करने वाले और इसी संदर्भ में कांग्रेस शासनकाल में भारत में कभी आये पॉप का तो लाल कालीन

बिछाकर  श्रीमती सोनिया स्वागत करतीं हैं और इशारों इशारों में भारत के पूज्य धर्माचार्य शंकराचार्य को

गिरिफ्तार कराके वो पॉप को संकेत भेजतीं हैं कि तुम चिंता न करो मैं ऐसे हालात पैदा कर दूँगी तुम जितनी

चाहो फसल काट लेना।

क्या राहुल ने अपनी माँ की इस मंशा को तो आगे नहीं बढ़ाया है। केवल सुब्रामनियम स्वामी द्वारा पप्पू कहे

जाने से वे दोषमुक्त नहीं हो सकते। देश की सांस्कृति इयत्ता पर आक्रमण करने वाले राहुल गांधी पर कानूनी

मुकदमें चलने चाहिए और यदि संविधान में इसके लिए संशोधन भी करना पड़े तो किया जाए। सीमाओं पर

हमला /घुसपैंठ करने वाले दुश्मनों से ऐसे लोग कम खतरनाक  नहीं हैं। ये लोग  कांग्रेस को मुबारक हों जो

पूर्व

में अमरीका से आये राजनयिकों के समक्ष बोलते हुए कहते हैं भारत को खतरा इस्लामी आतंकवाद से उतना

नहीं है जितना हिन्दू आतंकवाद से  है। 

यही  है शहज़ादे का वोटलक्षित प्रलाप। चर्च से प्रेरित माँ और चर्च से प्रेरित शहज़ादा। भारत के सांस्कृतिक

चैतन्य पर माँ बेटा मिलकर प्रहार करते हैं। 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

कबीरा ये तन जात है ,सके तो राखि बहोर , खाली हाथों वे गए ,जिनके लाख करोड़।

दोहे संत कबीर 

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इन दोहों में कवि कबीर ने जीवन की नश्वरता ,भक्ति के प्रभाव और मनुष्य 

द्वारा समय को व्यर्थ न गंवाने अहंकार को छोड़ने तथा परहित कार्य 

Maati Kahe Kumhar Se - Savitri Savneri

Maati Kahe Kumhar Se Singer - Shrimati Savitri Savneri.



करने की प्रेरणा दी है। 

वस्तुत : सतपथ पर चले बिन मनुष्य का सांसारिक जीवन मानसिक विकारों में ग्रस्त होकर नष्ट हो जाता है। मनुष्य जीवन को ईश्वर के वरदान के रूप में देखा जाता है। कबीर ऐसे संतकवि विभिन्न दृष्टान्तों से मोहमाया में फंसे प्राणि के उद्धार की कामना करते हुए कहते हैं कि अभी भी समय है कि अमूल्य जीवन को नष्ट होने से बचा लिया जाए क्योंकि शनैः शनैः यह जीवन काल के कराल मुख में अग्रसर होता जा रहा है। इसलिए कबीर मनुष्य को अन्याय और अत्याचार से निवारित करते हुए माटी और कुम्हार के माध्यम से कहते हैं :

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंधे मोहे ,

एक दिन ऐसा होयेगा ,मैं रौंधूंगी तोहे। 

कर्म के फल से जन्म और जन्मान्तर में भी बचा नहीं जा सकता। माटी प्रताड़ित और पीड़ित जीव का प्रतीक है तो कुम्हार  उस प्रताड़ना का कारक है जिससे माटी को गुज़रना पड़ता है। इसलिए माटी अपने प्रताड़क को सावधान करते हुए कहती है कर्म फल से कोई भी मुक्त नहीं हो सकता। आज मैं तुम्हारे हाथों से रौंदी जा रही हूँ तो अगले जन्म में ये सम्भव है कि तुम्हें अपने अत्याचार करने की सजा मिले और उस सजा को देने वाले जन्म का निमित्त मैं बनूँ। इसलिए कर्म के इस अनिवार्य चक्र को तोड़कर समाज में ऐसे कर्म करो जिससे पीड़ा और क्लेश कम हो और तुम्हें अगले जन्म में संताप से न गुज़रना पड़े।  

दुःख में सुमिरन सब करें ,सुख में करे न कोय ,

जो सुख में सुमिरन  करें  ,दुःख काहे को होय। 

इस दोहे में कबीर ने भक्ति विमुख होकर जीवन बिताने वालों को चेतावनी दी है कि जब तुम पर दुःख आता है तुम्हें अपने इष्ट देव और परमात्मा की स्मृति आती है। यदि तुम सुख और सुविधा के जीवनकाल में ईश्वर के 

स्मरण को निरंतर अपने जीवन का अंग बना लो तो फिर दुखों की याचना से गुज़रने के संताप से तुम बच जाओगे। ईश्वर कृपा से स्वमेव तुम्हारे 

दुखों का निदान हो जाएगा। 

कबीरा निर्भय नाम जप ,जब लग दीया बाती ,

तेल घटे बाती बुझे ,सोवेगा दिन राती। 

भक्ति के इस सच्चे भाव को बढ़ाते हुए कबीर मनुष्य को समय रहते सावधान करते हुए कहतें हैं कि जब तक तुम्हारे शरीर  में प्राणों का संचार हो रहा है -हे मनुष्य !उस निर्भय स्वरूप परमात्मा का स्मरण करते रहो। वो परमात्मा अपने नाम के स्मरणकर्ता को अपना स्वरूप प्रदान कर उसे मृत्यु के भय  से मुक्त कर देता है।यदि जीवन में ऐसा नहीं किया गया तो जीवन के मूल्यवान प्राण मृत्यु के हाथों हर लिए जाएंगे और तब ईश्वर से दूर होकर नए जन्म की अवधि तक एक अँधेरी यात्रा से गुज़रना होगा इसलिए यदि इस जन्म के रहते ईश्वर का स्मरण नहीं किया तो मरणोपरांत की यातनाओं से मुक्ति नहीं मिलेगी।  

सांस सांस सुमिरन करो ,वृथा सांस न खोये ,

न जाने किस सांस का आवन होय न होय। 

मनुष्य जीवन की अमूल्य सम्पत्ति को ईश्वर की अर्चना के बिना व्यर्थ खोने वाले व्यक्तियों को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि हर श्वांस   में अपने आराध्य देव का नाम स्मरण करते रहना चाहिए। सांस ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुए हैं इसलिए ईश्वर से विमुख होकर इन्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह निश्चय नहीं है कि ईश्वरीय प्रसाद के रूप में हमें अगली सांस मिले न मिले। ऐसी स्थिति में ईश्वरीय नाम अपने प्राणों की सांस को एकलयता में स्वरूपित करने का भक्तिपथ अपने हाथ से न जाने दें।  


पता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय ,

अब के बिछुड़े कब मिलें ,दूर पड़ेंगे जाय। 

मनुष्य शरीर की नश्वरता की उपमा वृक्ष और उसके सूखे पत्तों से देते हुए कवि कबीर कहते हैं कि जैसे हवा के झौंके अथवा अपनी परिपक्वता में कोई पता अपने मूल अधिष्ठान वृक्ष से टूटकर कहीं दूर जा गिरता है और फिर वह अपने मूल से जुड़ नहीं पाता उसी प्रकार अपने ईश्वर से विमुख रहने वाले जीव को मृत्यु आकर दबोच लेती तो उसे अपने इष्ट देव  का नाम भी स्मरण करने का अवसर नहीं मिलता। इसलिए कवि कहते हैं कि जब तक शरीर में सांस है कृतज्ञ होकर उस ईश्वर का स्मरण करते रहें।   





कबीरा आप ठगाइये ,और न ठगिए कोये  ,

आप ठगे सुख उपजे ,और ठगे दुःख होये । 

महाकवि कबीर जीवन की सच्चाई को तात्विक दृष्टि से मनुष्य के सामने रखते हुए कहते हैं कि दूसरे का अहित करने वाला अपना ही अहित करता है। माचिस की तीली जलने (जलाने )से पहले स्वयं जलती है। इसी प्रकार जो अनीति और अन्याय से दूसरोँ को ठगने का षड्यंत्र करता है वह स्वयं जीवन के वरदानों से ठगा जाता है। इसलिए सच्चे संत और सतगुरु ये कहते आये हैं कि जो दूसरों को छल पूर्वक हानि पहुंचाने से पहले स्वयं के साथ वैसा व्यवहार किये जाने की यदि कल्पना कर लेंगे तो वे दूसरों के साथ अन्याय करने के पाप से बच जाएंगे। आगे  चलके इन्हीं भावों को महाकवि तुलसीदास ने इन शब्दों में कहा -

परहित सरिस धर्म नहीं भाई ,

पर पीड़ा सम नहीं अधमाई। 


चेत सके तो चेत ले ,सत गुरु कहे पुकार ,

बिन भक्ति छूटे नहीं बहुबिधिजम  की मार।

कबीरा ये तन जात है ,सके तो राखि बहोर ,

खाली हाथों वे गए ,जिनके लाख करोड़। 

जीवन की नश्वरता को स्पष्टता से संकेतित करते हुए कवि कहते हैं -कि  मनुष्य  मृत्यु के पंजे से बच नहीं सकता, हे मनुष्य तुम्हारा ये जीवन नश्वर है तुम्हारे इस जीवन की स्मृति को लोग भुला देंगे तुम चाहो तो अपने इस जीवन में परहित के शुभ कर्म करते हुए अपनी स्मृतियों को स्मरणीय बना सकते हो क्योंकि केवल अपने लिए जीने वाले और मात्र अपने हेतु लाखों करोड़ों कमाने वाले अपनी मृत्यु के बाद संसार के लोगों द्वारा इसलिए भुला दिए गए क्योंकि उन्होंने परहित में कोई ऐसा काम नहीं किया था जिससे मृत्यु के उपरान्त वे लोगों की स्मृतियों  में अपना स्थान बना पाते इसलिए जीवन वह नहीं है जो तुमने अपने लिए जीया। सच्चा जीवन तो वह है जो तुम औरों के लिए जीते हो। 

Maati Kahe Kumhar Se - Savitri Savneri

Maati Kahe Kumhar Se Singer - Shrimati Savitri Savneri.

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय , ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग। त्यों त्यों उज्ज्जल होय

या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय ,

ज्यों ज्यों  बूड़े श्याम रंग। त्यों त्यों उज्ज्जल होय 


                       ______________डॉ. वागीश मेहता डी.लिट. १२१८ /४                                                       अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाण)
                                                    भारत  

तस्वीर

(डॉ। नन्द लाल मेहता वागीश )

हम से लगभग सभी भारतीयों ने विशेषकर उत्तरभारतीय लोगों ने हिंदी भाषा और साहित्य को पढ़ा है। हो सकता है आज आयु का अनुभव हमारी समझ को एक नै धार दे रहा हो पर सच्चाई तो यही है कि शब्द में छिपी अपार शक्ति को अपनी अध्यापकीय पद्धति से हम समझने में असमर्थ रहे है.ये किसी के दोष का प्रश्न नहीं है पर इतना तो निश्चित है कि जब किसी सम्बुद्ध और सुबुद्ध भाषाविद और साहित्य मर्मज्ञ शिक्षक से पढ़ते हैं तो हिंदी भाषा की अंतरंग शक्ति और साहित्य का मनोमुग्धकारी सौंदर्य आपके सामने साकार हो उठता है। इस प्रसंग का सीधा सम्बन्ध मेरे मित्र डॉ. (प्रोफ़ेसर नंदलाल )मेहता वागीश से है जिन्होंने प्रस्तुत दोहों में निहित अर्थ और भाव सौंदर्य को इन शब्दों में उद्घाटित किया है :

या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय ,

ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग। त्यों त्यों उज्ज्जल होय। 



कविवर बिहारी का यह दोहा कृष्ण भक्ति और कृष्ण प्रेम के संदर्भ में है.कृष्ण के सांवले होने की धारणा भक्तों को अपनी और आकर्षित करती रही है ,तत्व की बात तो ये है कि कृष्ण की भक्ति करने वाले पुरुष भी स्वयं को गोपी भाव देखते रहे हैं। कृष्ण भक्ति का मधुर रस यही है कि पुरुष तो एक मात्र कृष्ण हैं बाकी सब गोपियाँ हैं ,प्रेम भाव की इसी नग्नता  को बिहारी ने इक छोटे से छंद दोहे में बहुत ही विलक्षण सौंदर्य से चित्रित किया है। 

कृष्ण प्रेम में डूबी आत्मा का अपने चित्त की स्थिति को सही सही न कह पाने ली लौकिक व्यवस्था को भक्ति के रंग में रंगे  हुए शब्दों में इस प्रकार कह दिया है कि कृष्ण रंग में मेरे चित्त की स्थिति को कोई भी समझ पा रहा ये बड़ा आश्चर्य है कि मेरे चित्त की वृत्ति ज्यों ज्यों उस काले (रंग वाले )कृष्ण के प्रेम रंग में डूबती है त्यों त्यों वह सात्विक और उज्ज्जवल निखार में आता है। सामान्य रूप से कृष्ण (काला रंग )रंग अपने का लेपन किसी को भी और रंग में रंजीत नहीं होने देता। वह उसे अपना ही रंग देता है। काले रंग पे किसी रंग का असर नहीं होता और काले रंग में डूबा हुआ कोई भी पदार्थ जड़ या चेतन कोई भी सत्ता काले रंग के प्रभाव से और उसकी रंगत से बच नहीं सकता पर इस काले कृष्ण की भक्ति का अद्भुत रहस्य तो यह है जो इस कृष्ण रंग में डूबता है वह और और निखरता है।  

एक घड़ी  आधी घड़ी ,आधी से पुनि आध ,

तुलसी संगत साध की ,हरे कोटि अपराध। 

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महाकवि तुलसीदास ने भक्ति में हृदय की शुद्धता और भावना की सफाई को महत्त्व  दिया है। आसनस्थ होकर बहुत समय तक भक्ति का प्रदर्शन करना और लोगों में भक्त होने का प्रदर्शन करना और लोगों में भक्त होने का भाव जगाना तो प्रयत्न साध्य  है किन्तु भक्ति प्रयत्न साध्य नहीं है,वह समर्पण साध्य है। भावना साध्य है। भले ही मन की ऐसी स्थिति बहुत कम समय के लिए हो तो भी वह भक्ति का शिखर है। सच्चे मन से भक्ति भाव में लगाई गई एक डुबकी भी आपको संसार सागर से पार उतार सकती है। बस इसी दृष्टि को प्रतिपादित करते हुए महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि सच्ची भावना से थोड़े समय के लिए भी परमात्मा की स्तुति और परमात्मा की भक्ति आपकी चित्त की चंचलता को नष्ट कर सकती है। परमात्मा का ध्यान महत्त्वपूर्ण  है।  समय का माप इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। यदि आप चित्त की शुद्धता से एक घड़ी  की अपेक्षा आधी घड़ी या उस आधी घड़ी के भी आधे समय के लिए अपने इष्ट देव को समर्पित हो जाते हैं तो आपको ईश्वर की निकटता अनुभव हो सकती है। पर ऐसा तभी सम्भव है जब आप किसी संत या गुरुरूप संत के सान्निध्य को प्राप्त कर लेते हैं तो उस सतसंगति का लाभ तुरंत फलदायी होता है। आपके भीतर का कल्मष दूर हो जाता है और आपके द्वारा किये गए अपराध अथवा पाप भी सतसंगति के प्रभाव से स्वमेव फलशून्य हो जाते हैं। आपका चित्त शांत हो जाता है, किसी ऐसे संत को पाकर आप परमात्म अनुभूति में डूब जाते हैं। तुलसीदास जी ने इस प्रकार संत की संगति को भक्ति का सर्वोच्च स्थान दिया है। 

शब्द सम्हारे  बोलिये ,शब्द के हाथ न पाँव ,

एक शब्द औषध करे ,एक शब्द करे घाव। 

इस दोहे में वाणी के महत्व को प्रतिष्ठित किया गया है। वाणी का उपयोग सावधानी पूर्वक होना चाहिए। यह वाणी है जो सुख शांति और प्रसन्नता का विधान कर सकती है। सबके हृदय को आह्लादित कर सकती है, उदारता से भर सकती है ,,एकता और सौमनस्य का संदेश दे सकती है। पर यदि वाणी का संयम नहीं है तो वह दु: ख  अशान्ति वैर -विरोध परस्पर के विभेद और वैमनस्य का कारक भी हो सकती है। शब्द वाणी का तत्काल फल है। शब्द वाणी का श्रुत रूप है एक बार उच्चरित होने के बाद वो सामाजिक हो जाता है। शब्द का प्रयोगकर्ता उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता इसलिए कवि शब्द के उच्चारण से पहले प्रयोक्ता को पहले से विचार कर लेने का सतपरामर्श देते हुए कहते हैं कि शब्द का प्रयोग विवेकपूर्वक करना चाहिए संभल के करना चाहिए। उच्चरित शब्द पाषाण सरीखे भी हो सकते हैं और फूल सरीखे भी ,पाषाण चोटिल कर सकता है और फूल का स्पर्श सुगन्धि का प्रसाद देता है इसलिए कवि ने कहा है कि शब्द के अपने हाथ पाँव नहीं होते अपना कोई भौतिक  रूप नहीं होता प्रयोक्ता की भावना उस शब्द के परिणाम को निश्चित करती है। 

यदि शुद्ध भावना से परहित की दृष्टि से शब्द का प्रयोग किया जाएगा तो वही शब्द हमारे मनस्ताप को शांत कर देगा हमारे मन :पीड़ा को दूर कर देगा। हमें आंतरिक उलझनों से मुक्त कर देगा। हमारा  दिग्दर्शन करेगा हमारे सभी मनस्-रोगों को हर लेगा ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक निपुण वैद्य के द्वारा दी गई उपयुक्त औषधि शरीर और  मन के तापों को  दूर कर देती है। यदि इसके विपरीत बिना सोचे समझे शब्दों का प्रयोग किया जायेगा तो शब्द पत्थर बनकर सुनने वाले को आहत कर देंगे। उसकी मन :स्थिति को चोट पहुंचायेंगे। उसकी सुख शांति को हर लेंगे। उसमें क्रोध आवेश अविवेक और हिंसक प्रतिक्रिया को जगायेंगे जिससे सामाजिक सुख शान्ति भंग हो जायेगी। इसलिए कवि का संकेत है कि शब्द का प्रयोग अपने सामाजिक दायित्व की भावना को अंगीकार करते हुए करना चाहिए। 

नीको हू लागत बुरा ,बिन औसर जो होय,

प्रात भई फीकी लगै ,ज्यों दीपक की लोय। 

इस दोहे में कवि ने नीतिगत विचार को प्राथमिकता दी है। संसार का सारा व्यवहार नीति से शोभित और सुंदर होता है। अनीति से ध्वस्त और त्रस्त होता  है। नीति और मर्यादा एक ही मूल्य के दो नाम हैं। दोनों लोकधर्म का हिस्सा हैं। दोनों ही लोकमंगल का विधान करते हैं। दोनों समाज को समृद्ध करते हैं। नीति आचरण का गतिशील मूल्य है। समाज नीति पर चलेगा तो व्यक्ति और समष्टि दोनों को सुख होगा। व्यक्ति नीति पर चलेगा तो उसे आत्मतोष प्राप्त होगा और समाज को सन्तोषकारी परिणाम मिलेंगे। कवि नीति के इसी महत्त्व को इस दृष्टांत से पुष्ट करते हुए कहते हैं 
कि बिना संदर्भ और अवसर के यदि थोड़ा सा भी व्यवहार किया जाए तो वह बुरे परिणामों को लाने वाला होता है। अप्रियता को बढ़ाता है और अपने समय और सन्दर्भ से कहा हुआ वह कार्य या शब्द सामाजिक व्यवहार को क्षति पहुंचाता है। व्यक्ति मन को अशांत कर देता है। विकृतियों  को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए चाहे वह छोटा सा कार्य अथवा बहुत सीमित कथन हो वह समाज के लोकमंगल को नष्ट कर देता है, और वह लोगों की अरुचि का विषय बनता है ठीक उसी तरह जैसे प्रात :काल  हो जाने और सूर्य उदित हो जाने के बाद भी कोई व्यक्ति दीपक की लौ को जलाये रखे। 

दीपक का संबंध रात्रि के अन्धकार से है और यदि अन्धकार सूर्य की किरण के साथ नष्ट हो चुका है तो दीपक की लौ को  प्रज्ज्जवलित रखना बुद्धिहीनता है।ऐसा व्यक्ति समाज में उपहास का विषय बनता है इसलिए कवि कहता है कि समय और संदर्भ से कटे हुए अच्छे काम भी समुचित आदर प्राप्त नहीं करते हैं।