शनिवार, 18 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 2,3

सत्संगति दुर्लभ संसारा ,

दुर्लभ सुलभ करा दे,ऐसा कोई संत मिले !

मेरा तार हरि संग जोड़े ,ऐसा कोई संत मिले। 

कल भगवान् का अंशों समेत अवतार हुआ था कथा में। 

घर -घर आनंद छायो  उज्जैनी नगरी में ,

राम जन्म सुनि , पुर नर -नारी ,

नाँचहिं गावहिं ,दे दे तारी ,उज्जैनी नगरी में। 

नेति नेति कहि  महिमा गावे 


वेदहु याको पार न पायो ,

वो बेटा  बन आयो ,उज्जैनी  नगरी में ,

उज्जैनी नगरी में। 

वेदहु बन के आयो ,उज्जैनी नगरी में। 

कौशल्या सुत जायो ,उज्जैनी नगरी में। 

अरे घर घर बजत  बढ़ायो ,उज्जैनी नगरी में। 

नाँचहिं गावहिं दे दे तारी ,उज्जैनी नगरी में। 
भगवान् राम का जन्म हो गया है अवध में जश्न का माहौल है :

जो  जैसे बैठहि उठी धावा -


जैसे ही राजमहल के  वाद्य यंत्र बजाये गये अटारियों से-जो जैसे भी स्थिति में था ,जहां भी बैठा था , जैसे भी था उठकर दौड़ा।

 भगवान् से मिलने के लिए किसी तैयारी  की आवश्यकता नहीं है। उपासना का सार तत्व है उल्लेखित चौपाई में।यही भगवान् से मिलने की आचार संहिता है। 

भगवान् से मिलने के लिए सिर्फ अपनी स्थिति बदलिए कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है बस अच्छे लोगों का संग साथ कीजिये बुरे आपको छोड़के स्वत : ही चले जाएंगे। 

संसार के काम में व्यवहार चाहिए भजन में स्वार्थ। भजन सबका अपना अपना जो कर ले सो तरे.भजन परमुखापेक्षी नहीं होता -तू करे तो मैं करूँ। 

भजन को सबसे पहले नज़र लगती है ,कोई देखता है तो हँसता है लो जी देखो स्वामी जी को। इसीलिए कहा गया है भोजन और भजन एकांत में। कोई देख न ले छिपा कर करें भजन इसके प्रदर्शन की भी जरूरत नहीं है।

भक्त को सूरदास की तरह होना चाहिए -विरह दग्ध -गोपियों की तरह विरह अग्नि में जलते सुलगते हुए होना चाहिए। आद्र और आर्त पुकार से मिलते हैं भगवान्। 

निसि दिन बरसत नैन हमारे ,
सदा रहत पावस ऋतु  हम पर ,
जप ते श्याम सिधारे। 
कहते हैं यमुना का पानी तो मीठा था ,कृष्ण द्वारका गए तो पूरे ब्रजमंडल का पानी खारा हो गया ब्रज वासियों के अश्रु -जल  से।

ब्रज के बिरही लोग बिचारे ,
बिन गोपाल ठगे से सारे। 

ऊपर से कृष्ण के सखा आ गए अपना ज्ञान बघारने। विरह अग्नि को उत्तप्त करने। नंदबाबा के घर का रास्ता पूछते हैं -गोपियाँ कहती हैं हम तभी समझ गए थे -ये कोई कृष्ण की उतरन पहनने वाला बहरूपिया है जिसे नंदबाबा का घर नहीं मालूम। 

बोली इस नाली  के संग -संग चला जा ,जहां जाकर ये खत्म हो वही नंद का घर है -वहीँ से निकलती है यह अश्रु -जल सिंचित धारा। 

आते ही तुमने हमारा जख्म कुरेद दिया। 

 (उद्धव कृष्ण के पुराने )वस्त्र ही पहनते थे इतना प्रेम था उनको कृष्ण  से।एक गोपी उन्हें दूर से देख बोली अपने कृष्ण आ रहे हैं दूसरी फ़ौरन उसकी बात काटते हुए बोली ,हमारे कृष्ण हमें देखवे के बाद रथ पे नहीं बैठे रहते रथ से उतर के दौड़े -दौड़े आते। ये कृष्ण नहीं हो सकते। कृष्ण लीलाएं गोपियाँ याद करती हैं :

अरे तेरो कुंवर कन्हैया मैया,

 छेड़े मोहि  डगरिया में ,

जल भरने यमुना तट जाऊँ ,

ये तो कंकर मारे गगरिया में। 

तमाम लीलाएं कृष्ण की गोपियों को सताने आने लगीं उद्धव जी को देख के। वैसा सा ही रूप बनाये थे।
उपासना के सूत्र का प्रसंग देखिये -

महाराज दशरथ राजमहल में आये भोजन करने -भोजन तैयार है पूछते हैं कौशल्या जी से ? 
हाँ  तैयार है : महाराज फिर बोले राघव कहाँ है ?

गली में खेल रहा है। 

सुमंत को भेजते हैं राघव को बुलाइये। दशरथ भगवान् को तो चाहते हैं आवाज़ नहीं लगाना चाहते। राया तो रथ पर जाते हैं ऐसे कैसे आवाज़ लगाते हुए भागें  बच्चों के पीछे। 

भोजन करति   बोले जब राजा ,
नहीं आवत तजि बाल समाजा। 
कौशल्या जब बोलन जाईं , ...... 

दशरथ जी धर्मात्मा राजा हैं। भोग को प्रसाद बनाइये -भक्त भोग नहीं प्रसाद पाता है।परमात्मा को भोग लगाने के बाद भोजन ही प्रसाद हो जाता है। 

 राम को गोद  में बिठाकर खाना तो खाना चाहते हैं दशरथ।लेकिन खुद गली में जाकर आवाज़ लगाने में उन्हें संकोच है।  आज गली में खेलते अपने बेटे राम को  बुलाने के लिए दशरथ नौकर सुमंत को भेजते हैं। 
"कल गुरु जी के सामने गिड़गिड़ाते थे जब मैं नहीं था।"- भगवान् नाराज़ हो गए।
"तुम राजा हो इसलिए तुम्हें नहीं  बुलाना चाहिए ? आवाज़ लगाने के लिए शर्म लग रही थी। "-अगर तुम्हें मेरा नाम लेने में शर्म लग रही है तो मैं आपका मुंह तक नहीं देखूंगा।यहां यही सन्देश देती है राम कथा। राम पुकारने से ही मिलते हैं।  
कौशल्या तो भगवान् के पीछे दौड़ती रहतीं हैं माँ हैं -भक्ति में पागल हैं भगवान् की। 

भगवान् कहते हैं आप जीतीं मैं हारा ,भगवान् रास्ते में ही रुक जाते हैं भागते -भागते । ये भक्ति मार्ग पागलों का पागलखाना ही है। 

लोग कहे मीरा भई बावली ...

मीरा जी ने किसी की नहीं सुनी लोगों ने उन्हें गाली दी मीरा ने उन्हें गीत दिया। जो जिसके पास होता है वह वही देता है। 
चरित्र करके दिखाया जाता है भगवान् राम यही करते हैं -माता ,पिता ,गुरु तीनों की चरण वंदना करते है प्रात : उठते ही। 

जिन मातु पिता की सेवा की ,

तिन तीरथ धाम कियो न कियो । 

जिनके हृदय श्री राम बसें ,

तिन और को नाम लियो न लियो।

सन्देश यहां पर यही है कथा का -हुड़किये मत माता पिता को ,जो इनका अपमान करता है भगवान् उस से पीठ मोड़ लेते हैं। 

बूढ़ी  माँ को बच्चों और अपनी पत्नी के सामने जो पुरुष फटकारता है ,उस माँ को प्रसव की पीड़ा याद आ जाती है। 

'भादों के बरसे बिन ,माँ के परसे बिन' -

पेट नहीं भरता है -धरती भी प्यासी रहती है। यशोदा को कृष्ण की तरह प्यार न कर पाओ कोई बात नहीं उसका अपमान तो मत करो। 

माँ भोजन नहीं करती है बालक के भूखे होने पर।

 संतान और माँ साथ -साथ पैदा होते हैं जब पहली संतान पैदा होती है माँ भी तो तभी माँ बनती है।

माँ को कमसे कम इतना तो सोचने का मौक़ा दो -मेरा बेटा मेरा है। कुछ और न सही घर आने पर माँ का हाल चाल ही पूछ लीजिये। 

राम बचपन से इसी मर्यादा का पालन करते हैं। 

अब विश्वामित्र  रिषी   का प्रवेश हो रहा है कथा में :

हरी बिन मरै नहीं निसिचर पाती  
मन का अपना स्वभाव है वह एक बार में एक ही काम कर सकता है -कथा सुन रहे हैं तो कथा ही सुनिए ,स्वेटर मत बनिये ,बीज मत छीलिए ,जबे मत तोड़िये।

 जो इन्द्रीय सक्रीय होती है मन उसी में जुड़ जाता है।

सुनो  तात  मन चित लाई  -कथा को ध्यान से सुनिए। कबीर कहते हैं :

तेरी सुनत सुनत बन जाई ,
हरि कथा सुनाकर भाई।
रंका तारा ,बंका तारा ,
तारा सगल कसाई ,
सुआ पढ़ावत गणिका तारी ,

तारी मीराबाईं  ,
हरिकथा सुनाकर भाई। 
गज को तारा गीध को तारा ,

तारा सेज सकाई ,
नरसी धन्ना सारे तारे ,
तारी करमाबाई । 
जो कुछ हम कानों से सुनते हैं वही हमारे मन में बस जाता है। हनुमान चालीसा में इसका प्रमाण है

प्रभु चरित्र  सुनबै के रसिया  
राम लखन  सीता मनबसिया .....
भोग बसें  हैं मन में ,तो भोग को ही खोजोगे ,भगवान बसे  हैं तो भगवान् को खोजोगे ,भगवान् की खोज संतों के मिलन से पूरी होती है। 

बिनु हरिकृपा मिलहिं  नहीं संता ,

सतसंग भी कुसंग की तरह संक्रामक होता है।इसकी virility का अंदाज़ा नहीं लगा सकते आप।  

जब संत मिलन हो जाये  ,तेरी वाणी हरिगुण गाये, 

तब इतना समझ लेना, अब हरी से मिलन होगा।

जब संत मिलन हो जाये ,तेरी वाणी हरिगुण गाये ,

आँखों से आंसू आये ,
तेरा मन गदगद  हो जाये ,
दर्शन को मन ललचाये ,
कोई  और न मन को भाये ,
तब इतना समझ लेना ,
अब हरी से मिलन होगा। 
कथा सुन ने की लालसा है तो कोई न कोई संत भी मिल ही जाएगा। चाय पीने की लालसा है तो कोई खोखा भी चाय का मिल ही जाएगा। 
विश्वामित्र -राम के भक्त बड़े पुरुषार्थी तपस्वी महात्मा हैं। लेकिन निशाचरों से मुक्त न हो पाए।इन्होनें त्रिशंकु नाम के राजा को सशरीर स्वर्ग में भेज दिया नियम विरुद्ध जब देवताओं ने विरोध किया तो  एक नए स्वर्ग की ही रचना कर दी लेकिन निशाचरों से मुक्त नहीं हो पाए। हथियार डाल दिए ,यज्ञादिक अनुष्ठान छोड़ दिए। 

निशाचर कोई व्यक्ति नहीं है वृत्ति है।आदतों को प्रवृत्ति को नहीं कहते निशाचर । वह नहीं हैं ये जिन्हें हम राक्षस समझते हैं। 
निसाचर योनि नहीं है ,जो आदतें आपको निशि में विचरण कराती हैं  निशाचरण कराती हैं।वे आदतें जो हम को  उजाले से अँधेरे में ले जाती हैं ये आदतें संतों को भी सतातीं हैं। बीमारी सताती नहीं हैं दुष्प्रवृत्तियाँ सताती हैं -

सताती मतलब -सतत ,एक पल भी नहीं छोड़तीं दुष्प्रवृत्तियाँ। 
बुराई को भगवान  ही दूर कर सकते हैं। अच्छों के पास बैठो।बुराई से कोई अनुष्ठान ,पूजा पाठ नहीं बचाता है ,रोग तो औषधि से दूर होगा ,जब मनुष्य का सिर खाली रहेगा उसे बुराई से कोई बचा नहीं सकता। 
माता पिता को सर पे रखिये ,गृहस्थी होने पर अपने छोटे बच्चों को अपने सर पे बिठाइये -वे मेरे इस आचरण के बारे में क्या सोचेंगे जो मैं करने जा रहा हूँ । करने से पहले सोच लें।     

हरिबिनु मरै न निसचर पापी (पाती )

केहि कारण आगमन तुम्हारा ,
कहउँ सो करदन बाहउ  वारा ?

दशरथ जी ने जब पूछा विश्वामित्र से- 

बोले विश्वामित्र रोते हुए मैं तुमसे भीख मांगने आया हूँ -
असुर समूह सतावन ...

मैं याचन आयो नृपत 

भगवान् राम खड़े थे उन्होंने तभी निर्णय ले लिया मेरे पिता के राज्य में ऋषि रो रहें हैं। भगवान् ने तभी प्रतिज्ञा कर ली ,मेरे राज्य में कोई दुखी नहीं रहेगा ,किसी ऋषि तपस्वी को रोना नहीं पड़ेगा ।

साधू !जवानी में अनुष्ठान करते हैं बुढ़ापे में सुख पाते हैं इस धर्मचर्चा का। "मैं सनाथ होना चाहता हूँ राजन ,अभी तक मैं अनाथ हूँ ,भगवान् से दूर हूँ ,आप  राक्षसों को तो मार देंगें मैं तो अनाथ ही रहूँगा ,मुझे राम -लक्ष्मण की जोड़ी चाहिए। "-सविनय बोले थे विश्वामित्र दशरथ जी को। 
विश्वामित्र जी रामलखन को ले जाते हैं इसके आगे की चर्चा अगले अंक में। 
जयश्रीराम !जयसियाराम !जैसीताराम !

 सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 2


(२ )https://www.youtube.com/watch?v=3qAK69WGJTc

(3 )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 3

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

What is Gout , Treatments and drugs (Hindi l, ll) ?

गाउट या गठिया जिसे संघिवात भी कह दिया जाता है जोड़ों के दर्द की ही एक ऐसी किस्म  है जिसमें अक्सर पैर  के अंगूठों के जोड़ ज्वलनशील होकर सूज जाते  हैं  ,रक्तिम हो जाते हैं  संवेदनशील इतना हो जाते हैं  के यकायक अगर लिहाफ या कंफर्टर भी अंगूठों से  छू जाए तो बर्दाश्त के बाहर तकलीफ होने लगती है।

दर्द का हमला होने में कभी कभार १२ से भी कम घंटों का समय लगता है। बारहा इसकी पुनरावृति होने लगती है। 

अक्सर खून में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ जाने से इसके लक्षण प्रकट होते हैं। खानदानी कारणों आपकी आनुवंशिक बनावट जीनोम संरचना विस्तार के अलावा आपका खानपान दिनचर्या से भी जुड़ा है यह रोग। 

इसी खानपान के भ्रष्ट होने पर खून में यूरिक एसिड का स्तर इतना ऊपर चला आता है के उसके क्रिस्टल (मणिभ )बनकर जोड़ों ,कंडराओं (tendons )और असरग्रस्त जोड़ के निकट -तर ऊतकों में घर बनाने लगते हैं इसी से असहनीय पीड़ा होती है। 

मांस पेशी को हड्डी (अस्थि )से जोड़ने वाली नस टेंडन या कंडरा कहलाती है। 

ज्यादा बीअर पीने और मांस (खासकर रेड मीट )खाने वाले इसकी चपेट में ज्यादा आते हैं। 

लेब टेस्ट्स (परीक्षण )और रोगनिदान 

(१ )अक्सर प्रभावित जोड़ से एक सिरिंज के द्वारा तरल खींच कर इसकी माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी )से जांच करने पर अगर यूरेट के क्रिस्टल होने की पुष्टि हो जाती है तो एक तरह से रोग का पता चल जाता है। 

(२ )सीरम क्रिएटिनिन और यरिके एसिड का पता लगाने के लिए खून की एक  ख़ास जांच की जाती है। हालांकि कई मर्तबा खून में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ा हुआ होने पर भी व्यक्ति में गाउट के कैसे भी लक्षण प्रकटित नहीं भी होते हैं। 

जबकि कुछ में रोग के लक्षण तो मुखर दीखते हैं लेकिन यूरिक एसिड का स्तर स सामान्य ही  पाया जाता है। इसीलिए एक से ज्यादा जांच करके रोग निदान सुनिश्चित किया जाता है ,रोग होने की पुष्टि की जाती है। 

(३ )एक्स -रे जांच से दूसरे कारणों और जॉइंट -इन्फ्लेमेशन (जोड़ में जलन सूजन लाली होने की अन्य वजहों )को खारिज किया जा सकता है। 

(४ )अल्ट्रासाउंड (शरीर के अंदर जोड़ का चित्र प्रस्तुत करने वाली पराध्वनिक डाक्टरी प्रक्रिया   )जिसमें परा -श्रव्य ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें हमारा कान नहीं सुन सकता, इस जांच से जोड़ में तथा tophus में यूरेट क्रिस्टल के होने की खबर लग जाती है। 

यूरिक एसिड के कठोर क्रिस्टलीकृत रूप का उपास्थियों (Cartilages) ,जोड़ों और चमड़ी में जमा होना ही टोफुस (टोफस )कहा जाता है। 

Tophus is a hard deposit of crystalline uric acid and its salts in cartilages ,joints ,and  skin .

(५ )Duel Energy CT Scan 

त्रिआयामी चित्रण की यह विधि उस जोड़ में भी यूरेट  क्रिस्टलों के जमा होने का पता लगा लेती है जिनमें न अभी जलन है न लालिमा और न सोजिश। बेहद खर्चीला होने की वजह से यह टेस्ट आम तौर पर सब जगह न तो उपलब्ध है और न किया ही जाता है। 

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/gout/basics/tests-diagnosis/con-20019400

(२ )Diseases and Conditions

Gout


(३ )

Tests and diagnosis

By Mayo Clinic Staff
Gout
SynonymsPodagra
A small fierce creature with sharp teeth is biting into a swollen foot at the base of the big toe
The Gout (James Gillray, 1799) depicts the pain of the artist's podagra as a demon or dragon.[1][2]
SpecialtyRheumatology
SymptomsJoint painswelling, and redness[3]
Usual onsetOlder males[4]
CausesUric acid[4]
Risk factorsDiet high in meat or beer, overweight[5][4]
Similar conditionsJoint infectionreactive arthritispseudogout, others[6]
PreventionWeight loss, vitamin C, not drinking alcohol, allopurinol[4]
TreatmentNSAIDssteroidscolchicine[7]
Frequency1 to 2% (developed world)[4]





Gout is a form of inflammatory arthritis characterized by recurrent attacks of a red, tender, hot, and swollen joint.[3] Pain typically comes on rapidly in less than twelve hours.[4] The joint at the base of the big toe is affected in about half of cases.[8] It may also result in tophikidney stones, or urate nephropathy.[4]
Gout is due to elevated levels of uric acid in the blood.[4] This occurs due to a combination of diet and genetic factors.[4] At high levels, uric acid crystallizes and the crystals deposit in joints, tendons and surrounding tissues, resulting in an attack of gout.[4]Gout occurs more commonly in those who eat a lot of meat, drink a lot of beer, or are overweight.[5][4] Diagnosis of gout may be confirmed by seeing the crystals in joint fluid or tophus.[4] Blood uric acid levels may be normal during an attack.[4]

गाउट ,संघिवात या गठिया में इलाज़ और दवा- दारु का दिया जाना रोग की मौजूदा स्थिति से शुरू होता है इलाज़ तो हर हाल चाहिए ही आपकी मर्ज़ी भी पूछी जाती है उपलब्ध  विकल्पों के बारे में।

रोग के  तेज़ और उग्र लक्षणों के शमन के  लिए भी इलाज़ है भविष्य में ऐसे हमलों से बचाव भी होता है इलाज़ से और रोग का पेचीला पन भी कारगर और आपको माफिक आये इलाज़ से टलता ही है।यह पेचीला पन जोड़ में मोनो -सोडियम यूरेट क्रिस्टलों  के जमा होते रहने  से पैदा होता है।इस स्थिति को टोफ़स (Tophus )कहते हैं। गाउटी -टॉफ़ी (Gouty Tophi)भी। उल्लेखित लिंक देखें अंग्रेजी का। 

अक्सर उल्लेखित दवाओं का इस्तेमाल उग्र लक्षणों की तीव्रता कम करने आइंदा होने वाले रोग के उग्र रूप को मुल्तवी करना रहता है। 

(१)सूजन ,प्रज्वलन ,संक्रमण को रोकने का काम करने के लिए ऐसी दवाएं जिनमें स्टीरॉइड्स शामिल नहीं रहते हैं दी जाती हैं इन्हें ही 'नान  -स्टीरॉइडल एंटी -इंफ्लेमेटरी  ड्रग्स' कहा  जाता है।अंग्रेजी में (NSAIDs).

इनमें बिना डाक्टरी पर्ची के मिलने वाली सहज  उपलब्ध ओवर दी काउंटर ड्रग्स शामिल हैं यथा -आइबूप्रोफेन (Advil ,Motrin IB,others );नेप्रोक्सेन सोडीयम (Aleve,others ).

अलावा इसके तेज तर्रार ज्यादा पोटेंट दवाएं भी हैं जिनके लिए प्रिस्क्रिप्शन स्लिप चाहिए ,डाक्टरी नुस्खा उसके हाथ का लिखा चाहिए -इंडोमेथासिन (इंडोचीन या इंडोसन ),या केलकॉक्सिब (Celebrex,Celecoxib)इसी वर्ग में आतीं हैं। 

Do You Have Gouty Tophi?

You’ll know you have gouty tophi if you have “knobs” just under the skin that feel like buried marbles. And they don’t hurt, but they sure are hard. Do they look like this gout picture? Or are they not that bad yet? Gouty Tophi is NOTHING to mess around with. As painful and inconvenient as these knobs are….you must realize that they are also forming inside your organs. This is very serious, and yes it can even kill you.

gouty tophus

Gouty Tophus

JUNE 4, 2011Gouty Tophus is Your Last Warning Sign, because Gouty Tophus in your internal organs means….you die. No joke. You see all those gouty tophus lumps in these gout pictures?  Now visualize these same lumps inside your kidneys and liver.  Yep . . . you’re toast. Gouty tophus appears in the FINAL STAGES of gout…when your […]

(२ )कोल्चिकिने (Colchicine):

यह एक तरह की दर्दनाशी ,दर्द-हारी दवा ही है जिसे एनलजेसिक कहते हैं गठिया के दर्द को कम करने में ये एकदम से असरकारी रहती है। इसे ही Colcrys,Mitigare)कह दिया जाता है जो इसका व्यावसायिक नाम भी होता है। अलबत्ता इसके अवांछित पार्श्व प्रभाव (side effects )इससे मिलने वाले लाभ को बराबर कर देते हैं जिनमें शामिल हैं मतली (जी मिचलाना ,उबकाई आना ,वमन का हो जाना ,और अतिसार यानी उलटी दस्त साथ -साथ होना  -diarrhea). 

अलबत्ता रोग का उग्रतर रूप हल्का पड़ने ,शांत हो  जाने पर आइंदा होने वाले ऐसे ही हमलों से बचाव के लिए इसी दवा की छोटी खुराकें दी जा सकतीं हैं। 

(३ )कॉर्टिकॉस्टेरॉइड्स (Corticosteroids): 

ये दवाएं खाने वाली गोलियों के रूप में भी और सुईं (इंजेक्शन )के ज़रिये भी सीधे जोड़ में पहुंचाई जातीं हैं। प्रेड्निसोने इसी वर्ग की दवा है।अलबत्ता ये दवाएं उन मरीज़ों को ही दी जातीं हैं जिन्हें ऊपरलिखित दोनों वर्गों की दवाएं माफिक नहीं आती हैं या किसी और वजह से भी नहीं दी जा सकतीं हैं NASIDs और कोल्चिकिने। 

कॉर्टिकॉस्टेरॉइड्स के  पार्श्व  प्रभावों में आपके मिज़ाज़ में यकायक बदलाव का आना mood बदलना ,खून में तैरती शक्कर के स्तर का बढ़ना और ब्लड प्रेशर का स्तर बढ़ना आदि शामिल रहते हैं या रह सकते हैं। 

अलबत्ता ये गाउट से पैदा पीड़ा ,जोड़ की ज्वलनशीलता ,सूजन आदि  को कम करतीं हैं।  

अलावा इसके गाउट का पेचीला- पन से बचाव की दवाएं भी हैं :

उन मामलों में जिन में साल में कई हमले रोग के हो जाते हैं और ऐसा हर साल होता है या फिर हमले तो उतने नहीं होते लेकिन जो भी होते हैं उनमें पीड़ा असहनीय हो जाती है -पेचीलापन मुल्तवी रखने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। 

अलावा इसके गाउट का पेचीला- पन से बचाव की दवाएं भी हैं :

उन मामलों में जिन में साल में कई हमले रोग के हो जाते हैं और ऐसा हर साल होता है या फिर हमले तो उतने नहीं होते लेकिन जो भी होते हैं उनमें पीड़ा असहनीय हो जाती है -पेचीलापन मुल्तवी रखने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। 

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 1

एक संत का दर्शन करते हैं 'राम कथा' से पहले :संत रैदास  

परम गति के लिए गर्भ नहीं कर्म और स्वभाव महत्वपूर्ण होता है ,रैदास जी का जीवन इसे रूपायित करता है।
चमड़े का काम करने वाले इस संत का जन्म काशी में हुआ था । सात जन्मों से ब्राह्मण परिवार में आ रहे थे ,शूद्र जाति  में आ गये -परमगति प्राप्त हुई शूद्र जाति में आने के बाद ।

किस गर्भ में आप आये हैं इसके कोई ख़ास मायने नहीं हैं।परमगति के लिए कर्म आवश्यक है ,आपका स्वभाव क्या यह भी ? 

विदेह कोटि के संत हुए ,परमहंस अवस्था के - रैदास जी। 
गत जन्म की स्मृति थी रैदास जी को। अरे मैं तो ब्राह्मण था शूद्र शरीर में मेरा जन्म हो गया। अब ये बालक अपनी शूद्र माता का दूध न पिए ,स्वामी रामानंद जी  इनकी बस्ती में चलकर आये ,उन्हीं के आशीर्वाद प्रसाद से यह बालक पैदा हुआ था। इनके पिता को कोई संतान तब तक नहीं थी जब तक स्वामी रामानंद जी का प्रसाद इनको किसी और व्यक्ति ने लाकर न दिया था ।रामानंद जी ने देखा यह बच्चा तो वही है -बालक को आशीर्वाद दिया ,बोले बालक दूध पियो तुम्हें बहुत महान कार्य करने हैं। बस बालक दूध पीने लगा।गुरु का आदेश जो था। रामानंद जी ही इनके गुरु हुए हैं।   
काशी नगरी में हाहाकार मच गया ,एक संत की बस्ती में स्वामी रामानंद  के पहुँचने की खबर से। चर्मकारों की बस्ती थी ये। लेकिन साधु इसकी परवाह नहीं करता। साधु  तो निश्चिन्त होता है ,संसारी परवाह करता है लोगों की बातों की। साधु  नहीं।साधु मनमौजी होता है अपनी मौज़ में भगवान् की भी परवाह नहीं करता है। फक्कड़ी इसे ही कहते हैं। 

बचपन से ही पूर्वजन्म के संस्कारों की वजह से रैदास भक्ति ,पाठ पूजा में ही डूबे रहते थे। बाप ने सोचा इनकी शादी कर दो ढर्रे पे आ जाएगा करता धरता कुछ है नहीं।  अब पत्नी भी ऐसी ही पूजा पाठ में मग्न रहने वाली निकली। समस्या पहले से दोगुनी हो गई। ऐसे घर का खर्चा पानी मुश्किल से ही चलता। लेकिन साधु-सेवा ये अपना तन काटकर भी करते।   

एक दिन भगवान् साधारण साधु का वेश धर के इनकी छप्पर नुमा दूकान पर आ पहुंचे -सुना है तुम साधु सेवा में ही ज्यादा रहते हो  पूजा पाठ में तो बड़े पक्के हो लेकिन गृहस्थी की गाड़ी चलाये रखने के लिए तुम्हारी   आमदनी बहुत कम है ,ऐसा करो मेरे पास ये पारस मणि है ये लोहे को स्वर्ण में बदल देती है इसे तुम रख लो। भगवान ने जिस रापी (राँपी ) से   ये चमड़ा काटते थे उस को पारसमणि से छुआ कर उसे  स्वर्ण में भी बदल के दिखलाया।

रैदास बोले मेरे ये किस काम की है -मैं अपनी महनत से जो दो पैसे कमाता हूँ उसमें ही कटौती करके थोड़ी साधु  सेवा कर लेता हूँ। काम चल रहा है।आप ज्यादा ही ज़िद करते हो तो यही कहीं छप्पर में खौंप दीजिये ज़रूरत पड़ी तो देख लूंगा। 

भगवान् कहने लगे हम ने सुना है तुम्हारी पत्नी कड़ी -पकौड़ी बहुत अच्छी बनातीं हैं भोजन प्रसाद नहीं करवाओगे अपने घर। 

रैदास बोले मेरी जाति चमार है आप साधु  समाज से भी बहिस्कृत हो जाओगे और कुछ पैसे देने लगे।भगवान् ने कहा हम तो अच्युत गोत्री हैं तुम्हारी जाति के ही है वैसे भी-

 जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान ,
मोल करो तलवार का पड़ी रेहन दो म्यान। 

भगवान् भाव देखते हैं वस्तु नहीं।जाति नहीं भक्ति देखते हैं भक्त की।  भगवान्  ने ज़िद की तो ये साधु को घर ले आये और भोजन प्रसाद करवाया भोग निकालने के बाद। अब रैदास तो संत थे इनका रोम -रोम आज पुलक से भर गया ये नाचने लगे भगवान् का सानिद्य पाकर।     
आखिर साधु  वेश में थे तो क्या थे तो भगवान् ही -हम तो लाइन में लगते हैं और तिरुपति जैसी भीड़भाड़ वाली जगह में जब लम्बी प्रतीक्षा के बाद नंबर  आता है एक झलक पाकर ही वैंकटेश्वर भगवान की निहाल हो जाते हैं ये तो साक्षात भगवान् ही थे मंदिर में तो प्रतिमा ही निहाल करती है। 

चाह गई चिंता मिटी मनवा बे -परवाह ,

जाकु कछु न चाहिए सोहि शहंशाह।

आज मेरे घर आया रामजी का प्यारा ,

करहुं दंडवत चरण पखारूं  ,

तन मन धन संतन पे वारूँ  . 

आँगन भवन भयो अति पावन ,

हरिजन बैठे हरी जस गावन ,

कह रहे रैदास ,मिले -हरिदासा ,

जनम  जनम  की पूरी आशा। 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ......

एक वर्ष बाद भगवान् फिर लौटे बोले वो हमारी वस्तु तुम्हारे पास है उसका कोई उपयोग किया या नहीं -रैदास बोले हम को तो पता नहीं आप देख लो कहाँ रखी थी आपने।वहीँ रखी होगी।

भगवान् भी बड़े कौतुकी हैं लीला रची पारसमणि तो उठा ली रोज़ाना ठाकुरजी के नीचे पांच स्वर्ण मोहरे रख देते। 

रैदास वह मोहरे चिमटी से उठाते और गंगा में बहा देते। भगवान् ने दर्शन दिया -कहा रैदास अपनी ज़िद पर मत अड़ो ,सत्संग भवन और आश्रम बनाओ इन पैसो का। भगवान् की इच्छा सरआंखों पर। 

शानदार सतसंग भवन और आश्रम रैदास ने बनवाया भारी भीड़ उमड़ने लगी काशी के संतों पुजारियों को लगने लगा इसने तो हमारी दूकान ही बंद  करवा दी। 

संतों ने काशी नरेश को अपने हक़ में कर लिया। कहा ये जात का चमार कुछ टोना टोटका करता है मन्त्र -वंत्र इसे कुछ नहीं आते ,बुलाकर देख लो। लोगों को बहकाता है यह। 

काशी  नरेश ने ब्राह्मणों से कहा आप अपने ठाकुरजी लाइए ,रैदास को कहा आप भी अपने  ठाकुरजी लाइए -पद गाइये भगवान् को अपने पास  बुलाइये। 

ब्राह्मणों ने पद पे पद गाये भगवान् चलकर नहीं आये ,अपनी जगह से हिले भी नहीं। 

अब रैदास की बारी थी -

रैदास ने छोटा सा पद गाया -

हे हरि आवहु वेगि हमारे ,

पत राखो रैदास  पतित की ,

दशरथ राज दुलारे ,

हे हरी आवहु बेगि हमारे .....   

भगवान् छम छम करते हुए रैदास की गोद  में आ गए। ब्राह्मण अब भी नहीं माने बोले ये जादू टोना करता है। काशी नरेश ने माथा टेक  दिया इस चर्मकार के चरणों में। 

'विश्वनाथ प्रमाणित करें तब मानेंगे ये भगवान् तो इनके अपने हैं।'पंडित अभी भी अड़े रहे - काशी नरेश ने विश्वनाथ जी को माला पहना दीं ।

ब्राह्मणों ने पद गाए माला हिली नहीं रैदास ने गाया माला उड़कर उनके गले में आ गई।

काशी नरेश को शंकर जी का अवतार माना जाता है अक्सर आप रैदास के  पास आ जाते थे पद सुनने।एक बार रैदास जी ध्यान में बैठे थे -आँखें खोलीं  तो सामने काशी नरेश खड़े  थे। रैदास जी ने वही पानी इन्हें दिया जिससे चमड़ा धोते थे।नरेश ने पीने  का नाटक किया सोचते हुए चमड़े धोने वाला पानी ही दे दिया। पानी उनकी कोट की आस्तीन में चला गया। वहां निशाँ पड़  गए।

धोभी ने धोकर दाग छुड़ाने की लाख कोशिश  की और भाव समाधि में चले गए और यह घटना नरेश को बतलाई।   

जब प्यासे थे ,तब पीया नहीं ,

जिन पीया , पिया को जान लिया। 

भोला जोगी फिरै दीवाना,

 वो पानी मुल्तान गया। 

नरेश को अपनी गलती महसूस हुई और दोबारा पहुंचे ,वही चरणामृत  पीने को माँगा -बोले रैदास अब ये मात्र पानी है चरणामृत नहीं है ,इसे पीने का कोई फायदा नहीं  . 

ऐसा ही किस्सा गोरखनाथ जी के साथ जुड़ा हुआ है। 

एक बार ये काशी में रैदास जी के पास उनकी छप्परनुमा दूकान पर आये इन्हें उस समय बहुत ज़ोर से प्यास लगी थी इन्होनें रैदास से पानी माँगा -रैदास ने इन्हें अपने उसी पात्र में से पानी दे दिया जिसका इस्तेमाल ये अपने चमड़े को धोने के लिए करते थे। गोरखनाथ जी ने पानी अपने खप्पर में रख लिया और मन में सोचते हुए आगे बढ़ गए ,ये चर्म को धोने में प्रयुक्त होने वाला पानी मैं पीऊंगा ?

कबीर के घर पहंच गए काशी में -कमाली उन दिनों छोटी सी थी उसने कौतुक में इनका खप्पर उठाया और वह जल पी गई। कमाली बड़ी हुई उसकी शादी हो गई और वह शादी के बाद मुल्तान आ गईं उस समय पाकिस्तान का अस्तित्व नहीं था भारत अखंड था। 
कालान्तर में एक बार गुरु गोरखनाथ का मुल्तान आना हुआ। ये अपनी सिद्धियों के लिए जाने जाते थे। भारी सैलाब उमड़ा ,नगर का हर सभ्रांत  व्यक्ति चाहता था गोरखनाथ जी  भोजन प्रसाद उनके ही घर ग्रहण करें। 

गोरखनाथ ने इसके लिए एक शर्त रखी- जो कोई मेरे खप्पर को भर देगा मैं उसी के यहां भोजन प्रसाद ग्रहण करूंगा। कोई भी ऐसा न कर पा रहा था खबर कमाली तक भी पहुंची उसने अपने पति से कहा आप भी उन्हें बुलाओ मैं भी खप्पर सेवा करूंगी। पति बोला बावली हम जाति के भी जुलाहे हैं हम कैसे उस खप्पर को भर सकते हैं जिसे शहर के नाम- चीन लोग भी न भर पाए। 

उसने ज़िद की पति ने बुलवा लिया कमाली को सेवा का मौक़ा देने के लिए गोरखनाथ जी को आग्रह करके। गोरखनाथ आये -कमाली ने उनके खप्पर में एक चम्मच चावल डाला ,खप्पर भर गया। 
चमत्कृत गोरखनाथ बोले कमाली तुमने ये कमाल कहाँ से सीखा -बोली कमाली मैं ने कहीं से नहीं सीखा ये सब आपके खप्पर का ही कमाल है जब मैं छोटी थी आप हमारे घर काशी पधारे थे मैं खेल -खेल में इस खप्पर का सारा जल पी गई थी जिसे आप न पी पाए थे किसी संकोच -वश। 

अविलम्ब गोरख सीधे योगमार्ग से काशी आ पहुंचे रैदास के पास और उस पात्र को उठकर मुंह से ही जल ग्रहण करने लगे। रैदास हंसकर बोले यह अब सिर्फ चर्म धोने में प्रयुक्त पानी है कोई चरणामृत नहीं है। 

'मनचंगा तो कठौती  में गंगा ' मुहावरे का अपना प्रसंग है।
एक लालची पंडित थे गंगा स्नान को जा रहे थे पूछा रैदास से आप भी चलिए। वह कहने लगे भैया मेरे ये दो केले गंगा मैया को चढ़ा देना मैं तो न जा सकूंगा। 

पंडित जी ने ऐसा किया ज़रूर लेकिन गंगा मैया ने दोनों हाथ बाहर निकालकर जो एक हीरों का कंगन समेत आकाशवाणी के दिया पर वह वाणी सिर्फ पंडित जी ही  सुन सकते थे अन्य नहीं। कहा गया था ये कंगन मेरे रैदास को दे देना। पंडित जी लालच से भर गए इतना बेश -कीमती कंगन उन्होंने इससे पहले देखा ही कहाँ था। उन्होंने ये कंगन अपनी पंडाइन को दे दिया उसने कहा कहाँ इतना कीमती कंगन पहनूंगी लोगों ने मुझे पहने देखा तो कहेंगे इसने कहीं से चुराया है इस गरीब पंडाइन के पास यह कैसे आया ?उसके कहने पर उसने वह कंगन एक सुनार को बेच दिया। 

सुनार को पता था इतना कीमती कंगन खरीदने वाला काशी में कोई ग्राहक नहीं है उसने वह कंगन काशी नरेश को और नरेश ने वह अपनी पत्नी रानी साहिबा को दे दिया।कंगन उन्हें इतना पसंद आया वह दूसरे हाथ के लिए भी वैसा ही कंगन मांगने लगीं। राजा जेवर वाले सुनार के पास पहुंचा उनसे पता चला एक पंडित जी इसे बेच गए थे। पंडित जी ने नरेश को दंड के भय से सच -सच सब कुछ बता दिया। 

नरेश काशी रैदास के पास पहुंचे और उनसे कहा ऐसा एक कंगन और चाहिए -रैदास बोले पहले हाथ तो दिखाओ जिसमें ये कंगन आएगा। यानी कंगन भी चाहिए और अपना बड़प्पन भी बरकरार रखना है। रानी ने आखिरकार झुककर अपना हाथ दिखाया -रैदास ने कठौती में हाथ डाला  प्रार्थना की माँ गंगा से मैया मुझे इसके साथ का दूसरा कंगन दे दो ,ये तुम्हारे भक्त की लाज  का सवाल है। कठौती  में से हाथ बाहर निकाला तो उसमें कंगन था। 

तभी से ये मुहावरा चल निकला -

'मन चंगा तो कठौती  में गंगा ' -माँ गंगा अपने बेटे को कठौती में आकर कंगन दे गईं। 

संत संग तिन पातक टरहीं  -

मेरा तार हरी संग जोड़े,

 ऐसा कोई संत मिले , 

बस जीवन में यही आस होनी चाहिए। 

बाबा तुलसी कह गए हैं -

एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ,

तुलसी संगत साधु की काटे कोटि अपराध।  

   सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 1 2016 mangalmaypariwar.com


https://www.youtube.com/watch?v=n905zhrwnq8

अवधपुर बाजे बधैया ,जन्म लियो चारों भैया राजा दशरथ लाला जायो ,नाम धरे रघुरैया , अवधपुर बाजे बधैया ,जन्मलियो है चारों भैया राम लला की होत निछावर ,दही , माखन घृत दहिया , अवधपुर बाजे बधैया ..... बधाई हो ,बधाई हो ,....मिठाई हो मिठाई हो जय श्री राम ,जय श्री राम। .


गुरुवार, 16 नवंबर 2017

Vijya Shankar Kaushal JI Ram Katha Day 9 Part 3 Ujjain

भक्त कभी भगवान् को नहीं खोजा करता भगवान् ही खोजते हैं चाहे भक्त हिमालय की किसी गुफा में छिपा हो। 

भगवान् पुकारे जाते हैं भक्त पुकारा करते हैं डबडबाती आँखों से रूंधे गले से। 

गज ने पुकारो मैंने गरुण बचायो  ,

मैंने  गाह को पछाड़ो ,सुन प्रेम की पुकार। 

द्रौपदी पुकारी मोहे ,सुध लीजै बनवारी ,

मोहि आस है तिहारी ,कहुँ  जाऊँ का के द्वार 

करि देर नहीं  मैंने , तुरत ही चीर बढ़ायो। 

नाना भांत नचायो भक्तन ने मोहे ,

 तजि लाज ही नहीं मैंने ,

बैकुंठ ही बिसरायो मैंने ,

बहुत ही नांच नचायो 

भक्तन मोहे  बहुत ही नचायो। 

जागते रहिए बस  भगवान् आता है ,आएगा सबके द्वार पर आता है  लेकिन हम सोते मिलते हैं भगवान् बड़ा दयालु है जगाता नहीं है ,सो रहा है मेरा बालक ,जो जाग रहा है  उसके द्वार पर प्रभु कान लगाकर खड़े हो जाते हैं। -पूजा पाठ आदि जो भी हम करते हैं यह जागना ही है। 

जो जाग रहा है उसे भगवान् मिलता है -

जो सोवत है सो खोवत है ,

जो जागत है सो पावत है। 

भगवान ने बैकुंठ से संकेत कर दिया भविष्य वाणी कर दी -हे ऋषि डरो मत, हे !धेनु !डरो मत। मैं आ रहा हूँ। शंकर जी की बात सब देवताओं की समझ में आ गई सब वहीं खड़े होकर पुकारने लगे थे -हे भक्त वत्सल रक्षा करो,रक्षा करो ,रक्षा करो। भविष्य वाणी हुई :

"धैर्य रखो अंशों के समेत मैं  अवध में अवतार लेने आ रहा हूँ।"

सब किष्किंधा में पहुँच गए भगवान की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान् बालक बनकर प्रकट होने वाले हैं अवधपुरी में । 

अवधपुरी  रघुकुल मन राउ ,वेद विहित तेहि दशरथ नाहु 

धर्म धुरंधर गुण निधि ग्यानी ,...... सारंग पानी। 

श्री अवध (पुरी)  जहां कभी किसी का वध नहीं हुआ ,वहां भगवान्  प्रकट होते हैं।अयोध्या -जहां कोई युद्ध नहीं -शांत हृदय ,हृदय को अयोध्या बनाइये भगवान् का हृदय में प्राकट्य होगा। हृदय ही तो अयोध्या है ,जिसमें श्रीराम का निवास है। 

"दादी माँ !मेरे पिताजी की तो पुरोहिताई चल गई ,मैं किस की पुरोहिताई करूंगा ?बालक रो रहा है अरुंधति जी (गुरु माता )की गोद  में ,दशरथ जी आग्रह करके पूछ रहें हैं -गुरु माता के पैर पकड़ लिए हैं दशरथ जी ने कहते हुए यह कोई साधारण बालक नहीं है रो रहा है तो ज़रूर कोई बात होगी आप मुझे बताइये। गुरु माता दशरथ जी की उत्सुकता बढ़ाते हुए कहतीं हैं -आपके सुन ने लायक बात नहीं है कह तो रहा है ज़रूर कुछ ?"

दशरथ जी कहते हैं ऐसी क्या बात है ?कहिये आप ज़रूर कहिये निस्संकोच कहिये हम सुनेंगे -गुरु माता कहतीं हैं बालक कह रहा है -दादी मेरे पिता को तो पुरोहिताई मिल गई मैं किसकी पुरोहिताई करूंगा ?"

कहते हैं एक बार अरुंधति जी राजमहल में बैठी  वशिष्ठ जी से पूछ रहीं थीं क्या 'श्री लाल जी' का राजमहल में जन्म नहीं होगा। बोले वशिष्ठ जी हो तो जाए पर राजा में 'श्री लाल जी' की  लालसा ही नहीं हैं। 

अरुंधति जी बोलीं लालसा हम पैदा कर देंगें। वशिष्ठ जी ने कहा ठीक है एक काम आप कर दो -लाल जी को हम पैदा करवा देंगे। भले ये प्रसंग मानस  में नहीं है विजय कौशलजी कहते हैं हम को भी मालूम नहीं हैं लेकिन कुछ संत कहते हैं इसलिए हम भी बता रहे हैं। संकोच हमें भी हो रहा है। 

दशरथ जी मुख से तो एक शब्द नहीं बोले लेकिन जैसे किसी ने छाती पे हथोड़े से चोट मार दी हो। गुरु माता तो चली गईं। दशरथ जी को बड़ी आत्म ग्लानि होती है अपने कक्ष में आकर सारी  रात फूट -फूट कर रोते हैं। 

एक बार भू -पति मनमानी 

भई ग्लानि मोरे सुत नाहीं। 
...... ...... ...... 

निजी सुख दुःख सब गुरु ही सुनाये .... 


भगवान् हृदय में बोल गए -गुरु द्वारे जाओ तभी मैं आपके द्वार आऊंगा। 

गुरु गृह गयोहु  तुरत महिपाला ,

चरण लागि करि विनय बिचारा।

जो रो लिया वो भक्त हो गया। दशरथ जी महाग्यानी थे दशरथ जी को चुप कराते -कराते वशिष्ठ जी भी  रो दिए। 

"धरौ धीर "-राजन धीर धरो ,एक नहीं कई कई बच्चे आएंगे भले रानियां रजोनिवृत्त हो चुकी हैं।ये  बच्चे क्रिया से नहीं कृपा से आएंगे। 

श्रृंगी ऋषि वशिष्ठ बुलावा ,


पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया
 -और जैसे ही पूर्ण आहुति दी है यज्ञ नारायण स्वयं प्रकट हो गए -लो राजन प्रसाद लो सबको वितरण कर दो -जैसे ही तीनों माताओं ने प्रसाद का सेवन किया तीनो गर्भवती हो गईं।  

जिस दिन से भगवान् अयोघ्या में प्रकट हुए हैं :

सकल लोक सुख सम्पत छाये 

-सम्पूर्ण  लोक के साधन अयोध्या में आ गए। रिद्धि सिद्धियों की अयोध्या में बाढ़ आ गई। माताएं व्रत उपवास करने लगीं। 

सृष्टि का नियम  टूट गया ,जब सृष्टा ने ही नियम छोड़ दिया ,मनुष्य शरीर धार प्रकट हुए हैं -अब अयोध्या में भी महात्माओं का कुम्भ लगने लगा। माताओं में से उनके शरीर में से गर्भ के चित्र दिखाई देने लगे।

दिव्य ललाट जटाओं वाले  साधू महात्मा अवध में दिखायी  देने लगे। घर की दरो - दीवारों पर महापुरुषों के चित्र दिखाई देने लगे। सुंदर चित्र का गर्भवती माता के गर्भस्थ पर प्रभाव पड़ता है। आकाश में देवताओं के विमान मंडराने लगे। पूरे राजभवन की दीवालों में महापुरुषों के चित्र लगाए गए हैं। 
अपने घर का चरित सुधारना है, महापुरुषों के चित्र लगाइये घर की दीवारों पर सन्देश यही है। 


हरी प्रतीक्षित हैं -

हरी आ जाओ, हरी आ जाओ ,हरी आ जाओ 

पूरी रात अयोध्या पुकारती हैं पुकारने से ही भगवान् आते हैं 

राम जनम सुख मोल ... 

नौमी तिथि मधुमास पुनीता ,रामा  हो रामा ,

शुकल पक्ष अभिजीत हरिप्रीता ,रामा हो रामा 

मध्य दिवस अति शीत  न घामा ,हो रामा हो रामा ...... 

योग लग्न , ग्रह,  वार ,तिथि सब अनुकूल है  ,भगवान् का प्राकट्य होता है  

दोपहर बारह बजे का समय अभिजीत नक्षत्र -भगवान् का जन्म हो गया है 

दिन के बारह बजे का महत्व :

इस समय भूख लगती है प्राणी को -भूखा व्यक्ति क्रोध करता है ,जब जगत के भोगों की पीड़ा तुझे सताये,क्षुधा सताये  उस समय मेरा आगमन होगा।अगर तू राम -राम का कीर्तन करेगा तो तुझे विश्राम मिलेगा ,आराम मिलेगा -

सकल लोक गायक विश्रामा -जो भी ये कीर्तन जाएगा आराम पायेगा। 

भगवान् कृष्ण का प्राकट्य रात्रि बारह बजे होता है इसके भी निहितार्थ हैं :

यह रात का वह पहर है जब व्यक्ति को काम-वासना  सताती  है ,सन्देश यह है तब अपने बिस्तर पर उठके बैठ जाइये ,भगवान् को याद कीजिये दो मिनिट ,अवांछित ,अतिरिक्त 'काम' शांत हो जाएगा। 

आज नौमी का प्रात : काल है अयोध्या में भारी भीड़ है। सरयू पर साधू सन्यासियों की भीड़ है। कस्तूरी की चारो और सुगंध है। 'बारह का घंटा' बजते ही चतुर्भुज नारायण प्रस्तुत हो गए।

"आप तो दादा बनके आये हैं  जैसे नवजात शीशु  आता है मैं चार हाथ कहाँ से लाऊँ ?वैसे आइये नैमिष आरण्य में आपने वायदा किया था। आप शिशु बनिए -दुनिया के लिए रोइये जब आपका रोना शुरू होगा तब अयोध्या वासियों का रोना  बंद होगा -रोना शगुन है शुभ माना जाता है प्रतीक है इत्तला है शिशु के आने की आसपास को ।"-बोलीं हैं अनुनय विनय संग माता कौशल्या भगवान् से।  

कौशल्या माँ की गोद  में सांवले सलोने कुंवर (भगवान् )आये हैं  -दशरथ जी सुनकर नाचने लगे -सुमंत जल्दी बाजे बजवाओ। लड़के के होने पर तभी से बाजे बजते हैं.

 और बेटी के पैदा होने पर आज हिन्दुस्तान में नानी मर जाती है घरवालों की ,सबके मुंह लटक जाते हैं।बाजे तो वह भी बजवाती है विदा के समय।अपना भाग्य तो साथ लाती ही है - 

पिता के लिए सौ -भाग्य (सौभाग्य) लेकर आती है बिटिया इसीलिए उसके नाम के आगे लिखा जाता है सौभाग्यवती ,जिस घर में बिटिया  का जन्म नहीं होता उसमें भूत लौटते हैं। फिर भी बिटिया के जन्म पर बस दो बार पड़ोसियों को सूचना देने के लिए तवा बजाया जाता है फिर पूरे घर को सांप सूंघ जाता है दादी और बुआ के तो जैसे प्राण ही सूख जाते हैं। 

थोड़ी ही देर में कैकई भी अपने पुत्र भरत को और सुमित्रा अपने दोनों नवजातों लक्ष्मण शत्रुघ्न को गोद  में लिए आ जातीं हैं पूरा अवध ख़ुशी से  नाचने लगता है।कौशल्या जी की तो समाधि ही लग जाती है। 

अवधपुर बाजे बधैया ,जन्म लियो चारों भैया 

राजा दशरथ लाला  जायो ,नाम धरे रघुरैया  ,

अवधपुर बाजे बधैया ,जन्मलियो है चारों भैया 

राम लला  की होत  निछावर ,दही , माखन घृत दहिया ,

अवधपुर बाजे बधैया .....

बधाई हो ,बधाई हो ,....मिठाई हो मिठाई हो  

जय श्री राम ,जय श्री राम। .

तीनों भाइयाँ की जय हों, तीनों ही माताअन  की जय हो।

सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.youtube.com/watch?v=Wpd38pP_nP4


Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 9 Part 3 2016 mangalmaypariwar.com

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(१ )Did you mean: 

Vijay Shankar Kaushal JI Ram Katha Day 9 Part 3 Ujjain



Watch Special Live Telecast of Shree Ram Katha by Vijay Kaushal Ji Maharaj from Ujjain Day 9 Part 32016 ...

  








   



सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )Vijya Shankar Kaushal JI Ram Katha Day 9 Part 3 Ujjain 

( २ )

Published on Nov 23, 2016


Watch Special Live Telecast of Shree Ram Katha by Vijay Kaushal Ji Maharaj from Ujjain Day 9 Part 3 2016 mangalmaypariwar.com